लो-कार्ब डाइट, बौद्धिक प्रदर्शन और भावनाएँ

02 अप्रैल, 2020
लो-कार्ब डाइट सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली न्यूट्रीशन स्ट्रेट्जी में से एक बन गई है। हालांकि बौद्धिक और भावनात्मक बातों पर इन आहारों के असर पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। उन्हें यहाँ डिस्कवर करें!

कम कार्बोहाइड्रेट वाली डाइट जिसे लो कार्ब डाइट के नाम से भी जाना जाता है, काफी प्रसिद्ध हैं, खासकर भोजन के शारीरिक लाभ और वजन घटाने के मामले में दिल्चप्सी रखने वालों के लिए। क्या आप जानते हैं, वे आपको कॉग्निटिव या भावनात्मक लेवल पर कैसा असर डालते हैं? क्या वे लंबे समय तक टिकाऊ हैं?

किसी भी मैक्रोन्यूट्रिएंट से आपका शरीर ग्लूकोज हासिल कर सकता है, चाहे वे कार्बोहाइड्रेट हों या फैट या प्रोटीन हालाँकि जब यह कार्बोहाइड्रेट का इस्तेमाल नहीं करता है, तो इसके साथ इसकी दक्षता बहुत कम होती है, और इससे मस्तिष्क के कामकाज पर नेगेटिव नतीजे हो सकते हैं।

लो-कार्ब डाइट

“लो-कार्ब” डाइट का अर्थ ऐसा भोजन है जिसमें व्यक्ति कार्बोहाइड्रेट से समृद्ध खाद्य पदार्थों से अपनी कुल एनर्जी का 30% से कम हासिल करता है। हाल के वर्षों में वे शरीर में फैट लॉस के लिए सबसे ज्यादा उपयोग किये जाने वाले न्यूट्रीशन स्ट्रेट्जी बन गए हैं। मोटापे के खिलाफ इसके व्यापक इस्तेमाल का कारण शरीर में फैट इकठ्ठा होने में कार्बोहाइड्रेट की भूमिका के महत्व में छिपा है। हालांकि ऐसे दूसरे सॉल्यूशन भी हैं जिसमें उन्हें बैन करने के बजाय उनके सेवन को कम करने और उनके ग्लाइसेमिक इंडेक्स को एडजस्ट करने पर ध्यान देते हैं।

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लो-कार्ब डाइट और बौद्धिक प्रदर्शन

हालाँकि मानव मस्तिष्क शरीर के कुल वजन का 2% ही होता है, लेकिन आप रोज जितनी एनर्जी इस्तेमाल करते हैं उसके 20-30% का इस्तेमाल करता है। इस तरह यह एक बहुत ही ज्यादा मांग करने वाला अंग है, जो अपनी ज्यादा एनर्जी एफिशिएंसी के कारण कार्बोहाइड्रेट का ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में इस्तेमाल करता है।

मस्तिष्क अपनी जटिलता के परिणामस्वरूप इंसानी शरीर का सबसे ज्यादा मांग करने वाला अंग है।

लो-कार्ब डाइट और बौद्धिक प्रदर्शन

इस वजह से कई अध्ययनों ने निष्कर्ष निकाला है कि लो कार्ब डाइट सीखने, ध्यान लगाने और स्मृति से संबंधित संज्ञानात्मक कार्यों के प्रदर्शन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। हालांकि ऐसा लगता है कि यह सिर्फ कम समय में होता है। फिर भी यह भी सच है कि बहुत से लोग लंबे समय तक उन पर टिके नहीं रह सकते।

लंबे समय तक जब कार्बोहाइड्रेट नहीं खाना लाइफस्टाइल का हिस्सा बन जाता है, तो ऐसा लगता है कि कई एडाप्टेशन होते हैं जो अमीनो एसिड, प्रोटीन यूनिट और फैटी एसिड से एनर्जी उत्पन्न करना ज्यादा कुशल बनाते हैं। इस तरह ज्यादातर दीर्घकालिक स्टडी में कोगनिटिव फंशन में कोई गड़बड़ी नहीं दिखती।

दूसरी ओर जब हम पहले से मौजूद संज्ञानात्मक क्षति का शिकार हुए लोगों की बात करें तो ऐसा लगता है कि कम कार्ब वाले आहार फायदेमंद हो सकते हैं। दरअसल अल्जाइमर रोगियों का दिमाग ग्लूकोज का उपयोग एक ऊर्जा स्रोत के रूप में करने की अपनी क्षमता खो देता है, जिससे संज्ञानात्मक रुकावटें और बढ़ जाती हैं। हालांकि कम से कम बीमारी के शुरुआती स्टेज में रोगी का मस्तिष्क ऊर्जा पाने के लिए उन कीटोन बॉडी (ketone bodies) का इस्तेमाल कर सकता है, जो फैटी एसिड के टूटने से निकलते हैं।

इस प्रकार ऐसा लगता है, लो कार्ब डाइट आहार हल्के नुकसान वाले लोगों के कोगनिटिव कामकाज में सुधार करते हैं। अप्रैल 2019 में अल्जाइमर रोग जर्नल द्वारा प्रकाशित शुरुआती क्लिनिकल ट्रायल में इसे देखा गया था। हालांकि ऐसी डाइट गाइडलाइन को लम्बे वक्त तक बनाये रखना मुश्किल है।

डिस्कवर: माइक्रोबायोटा-एक्सेसिबल कार्बोहाइड्रेट (MAC)

भावनात्मक स्तर पर क्या होता है?

इस मामले में उल्टा होता है। लो-कार्ब डाइट कम समय में भावनात्मक स्थिति को नेगेटिव ढंग से प्रभावित नहीं करता है, ऐसा लंबी अवधि में होता है। इससे मस्तिष्क में सेरोटोनिन का लेवल घट जाता है

कार्बोहाइड्रेट मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ाते हैं, लेकिन प्रोटीन और फैट उन्हें कम करते हैं।

यह ऊर्जा में कमी, शुगर क्रेविंग, उदासी की भावनाओं, यहां तक ​​कि अवसाद में तब्दील हो सकता है।

लो-कार्ब डाइट पर टिके रहना

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लोगों को लो-कार्ब डाइट पर सख्ती से टिके रहना कठिन लगता है। इसके कारण कई हैं:

  1. कार्बोहाइड्रेट का सेवन न करना स्थापित सामाजिक स्टैण्डर्ड के विरूद्ध है। पश्चिमी संस्कृति में अनाज, कंद, फल और सब्जियाँ मुख्य खाद्य पदार्थ हैं। इसलिए उनका सेवन न करना कठिन हो सकता है और डाइट को नाकाम कर सकता है। मनुष्यों में भोजन का एक सामाजिक उद्देश्य भी है जो लो-कार्ब डाइट से पूरा नहीं हो सकता।
  2. कार्बोहाइड्रेट सेवन सीमित करना उपलब्ध खाद्य पदार्थों की रेंज को भी सीमित करता है। ये डाइट इतने लगाम लगाने वाले हैं कि वे अक्सर लोगों को नीरस और अस्थिर डाइट गाइडलाइन से चिपका देते हैं।
  3. जैसा कि आपने देखा, लो-कार्ब डाइट आपकी मनोदशा पर असर डाल सकते हैं। इसके अलावा लोगों को कभी-कभी अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए भोजन की ज़रूरत होती है, और इस तरह के खाने में यह असंभव है।

असाधारण मामलों को अगर छोड़ दें और सैद्धांतिक रूप से बताये जाने वाले उनके फायदों की परवाह न करें तो ऐसा लगता है कि लो-कार्ब डाइट स्वस्थ विकल्प नहीं हैं। वे थोड़े समय में बौद्धिक प्रदर्शन घटाते हैं, भावनात्मक स्थिति पर नेगेटिव असर डालते हैं और उससे चिपके रहना कठिन होता है। इसलिए ऐसे प्रतिबंधात्मक आहार से दूर रहना और स्वस्थ भोजन करना ही ठीक रहेगा। याद रखें कि इससे मिलने वाले फायदों की परवाह किए बिना सबसे अच्छी डाइट वह है, जिस पर आप अमल कर सकें।