ऑस्टियोपोरोसिस के बारे में 6 तथ्य

29 मार्च, 2021
ऑस्टियोपोरोसिस से होने वाली समस्याओं में से एक यह है कि इसका कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता जब तक कि यह एडवांस स्टेज में नहीं पहुंच जाए, जब फ्रैक्चर होता है और हमें इसकी उपस्थिति का पता चलता है।

ऑस्टियोपोरोसिस हड्डी की एक बीमारी है जो हड्डी के डीकैल्सीफिकेशन, विटामिन D की कमी या जेनेटिक फैक्टर के कारण हो सकती है। यह तब होती है जब हड्डियों के अंदरूनी माइक्रोस्ट्रक्चर में क्षय होता हैं, और उनके घनत्व और ताकत में कमी आती है। ऑस्टियोपोरोसिस के बारे में ज्यादा जानने के लिए इस आर्टिकल को पढ़ें।

ऑस्टियोपोरोसिस होने पर फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है और सूजनकारी रिएक्शन और तेज दर्द होता है।

वैसे तो ऑस्टियोपोरोसिस बुजुर्गों में एक सामान्य स्थिति है, पर कुछ लोग हड्डियों को खराब करने वाली चोट या गलत आदतों के कारण असमय इसका शिकार हो सकते हैं।

सबसे ज्यादा परेशान करने वाला तथ्य यह है कि कई अभी भी नहीं जानते हैं कि यह कितना गंभीर हो सकता है और लक्षणों के सामने न होने के कारण वे अपनी स्थिति से अनजान होते हैं।

इसलिए यह जानना जरूरी है कि ऑस्टियोपोरोसिस कैसे विकसित होता है। यदि आपमें इसका रिस्क फैक्टर है, तो आपको अपने डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।

1. ऑस्टियोपोरोसिस के रिस्क फैक्टर

हड्डियों का कमजोर होना आमतौर पर कम कैल्शियम और शरीर में विटामिन D के कम अवशोषण के कारण होता है, खासकर बुढ़ापे में।

  • इन पोषक तत्वों की कमी से हड्डियों की डेंसिटी कम हो जाती है और चोट या बीमारियों के कारण फ्रैक्चर और क्षति हो सकती है।
  • जेनेटिक फैक्टर के कारण यह स्थिति पैदा हो सकती है, हालांकि यह वयस्क होने पर होने वाले हार्मोनल बदलावों के साथ भी जुड़ा हुआ है।
  • टोबैको और शराब का ज्यादा सेवन ऑस्टियोपोरोसिस के विकास का कारण हो सकता है।
  • मेनोपाज के दौरान और बाद में एस्ट्रोजन लेवल (estrogen level) में कमी भी एक कारण है।
  • यदि आप एनोरेक्सिया (anorexia) या बुलिमिया (bulimia) से पीड़ित हैं तो आपको इस बीमारी के होने की ज्यादा संभावना है।

इसे भी पढ़ें : ऑस्टियोआर्थराइटिस, ऑस्टियोपोरोसिस और आर्थराइटिस : तीनों में क्या अंतर हैं?

2. लक्षण

दुर्भाग्य से इस बीमारी को “खामोश शत्रु” के रूप में जाना जाता है – यह साफ़ लक्षणों के साथ नहीं उभरता जब तक कि यह ज्यादा गंभीर समस्या न बन जाए।

  • अक्सर व्यक्ति को फ्रैक्चर होने पर पता चलता है कि वह बीमारी से पीड़ित है।
  • यह चोट किसी भी गहरे आघात या चोट लगे बिना हो सकती है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस की मौजूदगी पर संदेह तब भे होता है जब व्यक्ति की ऊंचाई 2-3 इंच या उससे ज्यादा कम हो जाए।
  • कुछ लोग विकसित होते हैं जिन्हें “Widow’s Hump” के रूप में जाना जाता है, जो एक ऐसी स्थिति है जिसे कूबड़ पोस्चर के द्वारा जाना जाता है।

3. ऑस्टियोपोरोसिस का पता लगाना


बीमारी का पता लगाने के लिए BMD नाम की एक स्टडी की जाती है, जिसमें बोन मिनरल डेंसिटी को मापा जाता है।

  • यह एक कम रेडिएशन वाला एक्स-रे है जिसमें ज्यादा समय नहीं लगता है और न ही इससे दर्द होता है।
  • रीढ़ और कूल्हे का टूटना फ्रैक्चर का संकेत हो सकता है।
  • दूसरी हड्डियों के सामान्य एक्स-रे आमतौर पर यह जानने के लिए उतने सटीक नहीं हैं कि क्या यह समस्या है या नहीं।

4. ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम

कई फैक्टर हैं जो उनके विकास का कारण बन सकते हैं, रिस्क को कम करने के लिए हेल्दी हैबिट के प्रैक्टिस निर्णायक है।

  • इस तरह अपनी डाइट में इन विटामिनों वाले फ़ूड इ जरिये कैल्शियम और विटामिन D को पर्याप्त मात्रा लेना सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • नेशनल ओस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन (NOF) वयस्कों में 50 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं और 70 साल से ऊपर वाले पुरुषों के लिए रोजाना 1000 मिलीग्राम और 1200 मिलीग्राम कैल्शियम  की सिफारिश करता है।
  • आपको सोडियम और सेचेरेटेड फैट का सेवन सीमित करना चाहिए क्योंकि वे कैल्शियम के अवशोषण में रुकावट डालते हैं।
  • यह मैग्नीशियम के अवशोषण को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हड्डियों की डेंसिटी को संरक्षित करने में भी मदद करता है।
  • डेली एक्सरसाइज बहुत फायदेमंद है, क्योंकि यह हड्डियों को मजबूत करने और कोआर्डिनेशन और बैलेंस में सुधार करने का काम करता है।

इस लेख को देखें: ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने में मददगार 6 डाइट टिप्स

5. समस्या को रोकने की दवा

मौजूदा समय में हड्डियों की डेंसिटी में होने वाले नुकसान से लड़ने के लिए दवाएं हैं, जो फ्रैक्चर जैसी गंभीर समस्याओं से बचने में मदद करती हैं।

  • इनमें बिस बाईस्फ़ॉस्फ़ोनेट्स (bisphosphonates) होते हैं, जो टिशू को सोखने वाले ओस्टोक्लास्ट (osteoclasts) नाम की कोशिकाओं को निष्क्रिय करके हड्डी की क्षय रोकते हैं।
  • कैल्शियम और विटामिन D की डोज की भी सिफारिश की जाती है, खासकर जब भोजन से इसे पाना मुश्किल होता है।
  • मेनोपाज वाली महिलाओं में एस्ट्रोजेन ट्रीटमेंट बीमारी को रोकने और इससे मुकाबला करने में मदद करता है।

6. इलाज के साइड इफेक्ट

हालांकि इस बीमारी के इलाज के लिए दवाएं असरदार हो सकती हैं, पर यह जानना महत्वपूर्ण है कि ज्यादातर मामलों में इनका लगातार इस्तेमाल साइड इफेक्ट पैदा कर सकता है।

साइड इफेक्ट में से हैं:

  • जॉइंट और मांसपेशियों में दर्द
  • एसोफेजियल क्षति (Esophageal damage)
  • पेट में जलन
  • एरिद्मिया (Arrhythmias) और हार्ट पैल्पिटेशन (heart palpitations)

दूसरी ओर, हमें यह जिक्र करना चाहिए कि भले ही वे असरदार ढंग से इलाज कर सकते हैं, लेकिन ऊपर बतायी गयी दवाओं की एक “समय सीमा” है। इसका मतलब है कि लगभग 3 वर्षों के बाद यह विश्लेषण करना जरूरी है कि इन दवाओं ने कितनी मदद की है और उनके नेगेटिव इफेक्ट क्या हुए हैं।

कुछ मामलों में लगातार इस्तेमाल करना खतरनाक होने से कुछ समय के लिए दवा का सेवन रोकना आवश्यक है।

ऑस्टियोपोरोसिस से निपटने का सबसे अच्छा तरीका ऑस्टियोपोरोसिस के बारे में जानना और बचाव है। इस कारण यदि आपमें रिस्क फैक्टर हैं, तो समय-समय पर हड्डी की डेंसिटोमेट्री कराएं।