स्पीच से अल्ज़ाइमर की शुरुआती पहचान करने की नई रिसर्च

मरीज की बातचीत के निरीक्षण से अल्जाइमर के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने से खराब होती दिमागी हालत को कम किया जा सकता है। शुरुआती लक्षणों के दीखते ही मरीज को इलाज मुहैया कराने का यही फायदा है।
स्पीच से अल्ज़ाइमर की शुरुआती पहचान करने की नई रिसर्च

आखिरी अपडेट: 30 जून, 2019

एक आदमी की रूह उसकी याददाश्त में होती है। इसके बिना आप अपनी पहचान, अपने विचार और अपनी भावनायें खो देते हैं। इसलिए अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी से पीड़ित होना बहुत ही खौफनाक है। बिना यह जाने कि आप वास्तव में कौन हैं, जिंदगी को जीने और आगे बढ़ने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।

कई रिसर्चर अपने करियर का एक बेहतरीन समय इस समस्या से मुकाबला करने के लिए डेडिकेट कर चुके हैं। हालाँकि इसके बाद भी, अभी तक इसका इलाज नहीं मिल पाया है, लेकिन शुरुआती लक्षणों की पहचान के मामले में बहुत ज्यादा तरक्की हो चुकी है।

इनमें यूनिवर्सिटी ऑफ़ बास्क कंट्री (UPV) के बायोमेडिकल इंजीनियरों की एक टीम द्वारा खोजा गया तरीका भी शामिल है। उन्होंने मरीज की स्पीच यानी बातचीत के जरिये अल्जाइमर रोग का पता लगाने के तरीके की खोज की है।

यह दर्द देने वाला टेस्ट बिल्कुल नहीं है। असल में, मरीजों को तो इस बात का पता भी नहीं चलता कि उनकी जाँच की जा रही है।

इसमें वे एक कहानी सुनाते हैं और उसी के हिसाब से उनके शब्दों को बोलने और दोहराने की क्षमता की जांच जाती हैं।

यह टेस्ट शब्दों के सीक्वेन्स को दोहराने वाले पुराने तरीकों की तुलना में एक ज्यादा बेहतर है क्योंकि उसमे मरीज को पता होता है कि उसकी जांच की जा रही है। जब उन्हें पता होता है, उनकी जांच की जा रही है, ऐसे में घबराहट होना और गलतियां करना आम बात है।

अल्ज़ाइमर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना आसान नहीं होता

अल्ज़ाइमर की शुरुआती पहचान: बातचीत

आम तौर पर, अगर किसी आदमी को अल्ज़ाइमर होने का शक है, तो पुराने तरीकों से जाँच करना एक दर्दनाक टेस्टिंग प्रोसेस की शुरुआत है: ब्लड टेस्ट , MRI, CT स्कैन।

महंगे हेल्थ केयर सिस्टम के अलावा यह मरीजों के लिए एक मुश्किल जांच भी हो सकती है।

लेकिन मरीज की बातचीत के जरिये अल्जाइमर का पता लगाने के इस तरीके ने इस तरह की स्थिति पर रोक लगा दी है।

जिस आदमी को अल्ज़ाइमर होने की संभावना होती है, उसे एक आरामदायक माहौल में उसके जीवन की किसी घटना के बारे में बात करने के लिए कहा जाता है। ठीक इसी समय डॉक्टर इस पूरी बातचीत को रिकॉर्ड करेगा ताकि कहानी में हुए बदलाव का अंदाजा लगाया जा सके।\

बास्क रिसर्च टीम ने, कुछ खास शब्दों को दोहराने के लिए थोडा रुकने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

अल्जाइमर के मरीजों के शुरुआती लक्षणों में से एक यह है कि वे अपने शब्दों को भूल जाते हैं, भले ही बीमारी अभी ज्यादा आगे न बढ़ी हो।

अचानक उन्हें रोजाना इस्तेमाल होने वाले शब्दों को याद करने में दिक्कत होने लगेगी जैसे माइक्रोवेव, कंघी आदि। ये उनके दिमाग से मिटते नहीं हैं, लेकिन वे जिस बारे में बात करना चाहते हैं उसके लिए उन्हें सही शब्द ढूंढना पड़ता है।

बातचीत के जरिये अल्ज़ाइमर के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने का यह तरीका हजारों लोगों की जिन्दगी बचा रहा है

अल्ज़ाइमर से पीड़ित दिमाग

UPV टीम ने इस नए तरीके की जरूरत पर ध्यान दिया, क्योंकि 46 मिलियन से भी ज्यादा लोग इस बीमारी को झेल रहे हैं।

इसके अलावा, उनका यह मानना है कि अगर कोई नया तरीका विकसित नहीं किया गया, तो रोगियों की संख्या बढ़ती ही जायेगी।

इसलिए इस तरह के किसी टेस्ट को अमल में लाना जरूरी है। यह ब्रेन को बहुत ज्यादा नुकसान होने से पहले ही डॉक्टर को बीमारी का इलाज करने में मदद करता है।

यहाँ पर रोगी अपने दिमाग को मजबूत करने के लिए एक्सरसाइज करना शुरू कर सकते हैं, ताकि जिन लोगों को आप प्यार करते हैं – या आपके खुद  का अस्तित्व समय के साथ धीरे-धीरे ख़त्म न हो जाये या उसे कोई नुकसान न पहुंचे।

इस रिसर्च का फायदा उन सभी इंस्टीट्यूशन में देखा जा सकता है जो इसे सपोर्ट करते हैं। इसमें कई जानी-मानी स्पेनिश यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं। इसके अलावा कई फैमिली एसोसिएशन भी इसे सपोर्ट करते हैं।

परिवार के लोगों को अल्ज़ाइमर की ऐसी जांच से राहत मिलती है

अल्ज़ाइमर की शुरुआती पहचान: बुजुर्ग

इसमें कोई शक नहीं है, अल्ज़ाइमर के रोगी बहुत ही दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरते हैं।

हालांकि, उनके परिवार के लोग खुद को अनचाही घटनाओं के जाल में फंसा हुआ पाते हैं। उन्हें समझ नहीं आता कैसे रियेक्ट करें।

इसी तरह की दूसरी बीमारियों में अक्सर मरीज खुद को बाकी लोगों से अलग कर लेते हैं और भटक जाते हैं।

ऐसे में फैमिली एसोसिएशन उन्हें पनाह देती हैं, जो कि उनके लिये एक बड़ी मदद होती है। यहाँ मरीजों को एक ऐसी जगह मिलती है जहां वे अपने ही जैसी परिस्थिति से गुजर रहे लोगों के साथ रहकर खुद की देखभाल कर पाते हैं (कुछ हद तक)।

यह पता होना जरूरी है कि आपकी जिन्दगी का सबसे खास इंसान धीरे-धीरे दूर हो जाएगा। उन्हें हर रोज अपनी हालत को बेहतर बनाने की कोशिश करने के लिए बढ़ावा दें।

वे बातचीत द्वारा शुरुआती लक्षणों का पता लगाने के इस तरह के तरीकों को सपोर्ट करते हैं। उन्हें उम्मीद है कि डॉक्टर कभी-न कभी तो इस बीमारी को ख़त्म करने का रास्ता ढूंढ लेंगे।

सिर्फ फैमिली एसोसिएशन ही इन डॉक्टरों के समर्पण की तारीफ नहीं करते – हम सब भी इसकी जरूरत को समझते हैं। कल यह बीमारी आपके माता-पिता या आपको भी हो सकती है।

कम उम्र में अल्ज़ाइमर के मामले आम होते जा रहे हैं। इसलिए शुरुआती लक्षणों की पहचान से जुड़ी किसी भी नई रिसर्च को महत्व देना और इस लड़ाई में ज्यादा से ज्यादा योगदान पाने के लिए काम करना जरूरी है।

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