हाइपर पेरेंटिंग: दुनिया को नाखुश बच्चे देने का तरीका

18 फ़रवरी, 2019
हाइपर पेरेंटिंग आपको अपने बच्चों की परवरिश करने का सबसे बेहतरीन तरीका भले ही लगे, लेकिन ऐसा करने से बच्चे आशंकित होकर अपना आत्मविश्वास खो सकते हैं।

अपने बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देने को हाइपर पेरेंटिंग (Hyper Parenting) कहते हैं। जहाँ कुछ लोगों के लिए यह किसी अंत तक पहुँचने का साधन मात्र हो सकता है, वहीं कुछ के लिए यह हमारी शिक्षा व्यवस्था पर ऊँगली उठाने का एक मौका होता है।

अपने बच्चों की परवरिश पर आप गहरी नज़र क्यों नहीं रखेंगे? लेकिन आप इसकी सीमा कैसे तय करेंगे? हरेक बच्चे को अपने माता-पिता के प्यार और निरंतर देखभाल की ज़रूरत होती है। लेकिन कभी-कभी यह समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि सही संतुलन कैसे कायम किया जा सकता है।

सच तो यह है, अपने बच्चों को भावनात्मक मंझदार में धकेले बिना उन्हें सही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने वाली लाइन बहुत बारीक होती है

ऐसा इसलिए है कि अपने बच्चों की परवरिश करने का मतलब उन्हें अपने अंगूठे के नीचे रखना नहीं होता। शिक्षा का मतलब किसी का दम घोंटना या अपने नन्हे परिंदों के पर काटना नहीं होता। कुछ ही सालों में वे अपने फैसले लेने लायक ज़िम्मेदार व्यस्क जो बन जाएंगे।

लेकिन ‘हाइपर पेरेंटिंग’ के कई और अर्थ भी होते हैं।

हाइपर पेरेंटिंग और ज़रूरत से ज़्यादा बचाव

इस प्रकार के व्यवहार या शैक्षणिक नज़रिये की सबसे अजीबोगरीब बात होती है, माता-पिता की अपने बच्चे के जीवन के हरेक पहलू में दखलंदाजी: पढ़ाई, खेल-कूद, शौक, खाना-पीना, यार-दोस्त चुनने समेत हर मामले में।

किसी “हाइपर पेरेंट” को यही लगता है कि दुनिया का सबसे अच्छा माता या पिता वही है और वह अपने बच्चे की परवरिश बाकी लोगों से बेहतर कर रहा/रही है। लेकिन उनके बच्चे के वास्तविक भावनात्मक व व्यक्तिगत संतुलन में ख़ुशी का कहीं कोई नामोनिशान नहीं होता।

हाइपर पेरेंटिंग से आपके बच्चे की ख़ुशी तहस-नहस हो सकती है

हाइपर पेरेंटिंग के नतीजे: निराशा

माता-पिता के मन में एक आदर्श बच्चे की स्पष्ट छवि हो सकती है। वे खुद को किसी फ़ॉर्मूले या बेंचमार्क की तरह भी देख सकते हैं।

लेकिन वक़्त बीतने के साथ-साथ बच्चों को अपने आदर्शों पर न चलते देख वे निराश हो जाते हैं

  • अपने माता-पिता की आँखों में उस निराशा को देखकर बच्चे में असफलता की हीन भावना घर करने लगती है।

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हाइपर पेरेंटिंग के नतीजे: एंग्जायटी और स्ट्रेस

ध्यान देने वाला एक पहलू यह है कि हाइपर पेरेंटिंग का “ज़रूरत से ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई” से एक करीबी रिश्ता होता है। ऐसे माँ-बाप के लिए अपने बच्चों को कई एक्स्ट्रा-करीकुलर एक्टिविटी में धकेल देना आम होता है, भले ही उनके बच्चों की उन गतिविधियों में रूचि हो या न हो।

  • धीरे-धीरे वे तनावग्रस्त हो जाते हैं। उनका एंग्जायटी लेवल बड़े-बुज़ुर्ग लोगों की एंग्जायटी लेवल तक बढ़ जाता है।
  • हाइपर पेरेंटिंग करने वाले माता-पिता को अपने बच्चों की गलतियाँ बर्दाश्त करने में मुश्किल पेश आती है। उनके बच्चे से कभी कोई गलती न हो या उनके हाथ कोई असफलता न लगे, इसकी वे पुरज़ोर कोशिश करते हैं। जैसाकि आप जानते हैं, यह असंभव है।

हाइपर पेरेंटिंग के नतीजे: असफल न होना

  • अपनी खुद की गलतियों से सीख लेने के लिए हर बच्चे को किसी न किसी चीज़ में असफल होने का अनुभव होना ही चाहिए।
  • हाइपर पेरेंटिंग के तहत पले-बढ़े बच्चे अपना ही आकलन करने लगते हैं। उनके माता-पिता उनसे इतनी ऊंची-ऊंची उम्मीदें लगाए बैठे हैं कि उन्हें पूरा कर पाने में अपनी नाकामी का विश्वास हो जाने पर वे डिप्रेशन और तनाव की राह पर निकल पड़ते हैं।
हाइपर पेरेंटिंग: अपने बच्चों की हद से ज़्यादा परवाह करना भी खराब होता है

बच्चों को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाने के लिए स्वस्थ रिश्तों वाली परवरिश

ओंटारियो (कनाडा) की क्वीन्ज़ यूनिवर्सिटी में हुई एक स्टडी के अनुसार हाइपर पेरेंटिंग के सबसे गंभीर नतीजों में से एक है, सात से बारह वर्ष के बच्चों को बाहर खेलने या अपने दोस्तों के साथ बात करने का मतलब ही नहीं पता होता। वे नाखुश होते हैं।

आप इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं, बच्चे की रक्षा करना उनकी परवरिश का ही हिस्सा होता है, लेकिन यह नीचे दिए पहलुओं पर आधारित होनी चाहिए।

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उनकी रक्षा करें, उन्हें अपना “गुलाम” न बनाएं

  • सही लगाव का मतलब होता है अपने बच्चे को पहचानकर उसके मन में एक अच्छी आत्म-छवि बनाना।
  • जिस बच्चे को अपने माता-पिता से सुरक्षा और सम्मान मिलेगा, उसका आत्म-सम्मान भी बेहतर होगा व उसे ज़िम्मेदारी के साथ बड़े और मेच्योर होने में कोई डर नहीं लगेगा।
हाइपर पेरेंटिंग से बचें

अपनी सलाह देकर उनकी सुरक्षा करें, पर अपनी खुद की गलतियों से उन्हें सीख भी लेने दें

अपने बच्चों को दुःख-दर्द से बचाने व सही रास्ते पर चलते रहने को प्रेरित करने के लिए उनकी रक्षा तो करें, पर उन्हें अपनी बात कहने दें व खुद गलतियाँ कर उनसे सीख लेने दें।

उनकी रक्षा कर उन्हें इस बात का एहसास दिलाएं, आप हमेशा उनका साथ देंगे

आपके रिश्ते का लगाव और उस रिश्ते की मज़बूती बेशकीमती हैं, खासकर आपके बच्चे की ज़िन्दगी के शुरुआती वर्षों में। लेकिन सात या आठ साल की उम्र हो जाने पर बच्चे बहुत तेज़ी से परिपक्व होने लगते हैं।

  • उम्र के इसी दौर में पहुंचकर वे अपने हक़ की मांग करने लगते हैं, न्याय और नैतिकता की एक धारणा बना लेते हैं। बड़े होने से पहले के उस अस्त-व्यस्त-से चरण में उनके कई फैसलों से आपको हैरानी भी हो सकती है।
  • हमेशा उनकी बात सुनकर उन्हें समझाएं कि आत्मनिर्भर होने के लिए उन्हें ज़िम्मेदार बनना होगा, कि कुछ अधिकारों का लाभ उठाने के लिए उन्हें कुछ दायित्व भी उठाने होंगे।

हाइपर पेरेंटिंग से उन्हें सब कुछ खुद सिखाने की कोशिश करने के बजाये आपको उन्हें अपने अनुभवों से सीख लेने की प्रेरणा देनी चाहिए। यही सबसे ज़रूरी बात है।