अपने शिशु के साथ कभी न करें ये 8 चीज़ेंं

शिशु जब हमारी ज़िंदगी में आता है, तो उसकी देखभाल से संबंधित तमाम जानकारी ले चुकने के बावजूद अक्सर हमारी समझ में नहीं आता कि क्या करें। हमारी इस पोस्ट में जानिए उन 8 चीज़ों के बारे में जो आपको अपने शिशु के साथ कभी नहीं करनी चाहिए।
अपने शिशु के साथ कभी न करें ये 8 चीज़ेंं

आखिरी अपडेट: 20 जून, 2019

शिशु जब अपनी माँ की बाहों में समाया होता है, तो वह बड़ा खूबसूरत नज़ारा होता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि माँ का हृदय भी खूबसूरत भावनाओं से भरा होता है, लेकिन साथ ही थोड़ी घबराहट भी रहती है, खासकर अगर वह पहली बार माँ बनी हो।

उन दादियों,बहनों,चाचियों और दोस्तों की ढेर सारी सलाहों के बावजूद, जो माँ बन चुकी हैं, प्रसव पूर्व क्लासों में जा चुकी हैं और सैकड़ों वेबसाइट खंगाल चुकी हैं, एक नई माँ को पहली बार बच्चे को संभालते समय यह पता नहीं होता कि वह उस सारी जानकारी का आखिर करे क्या।

अब हम बताने जा रहे हैं ध्यान रखने की वह खास बातें जब शिशु घर पर आ जाए। हमारा मकसद सिर्फ़ यही है कि मातृत्व का आपका पहला कदम सही पड़े।

नीचे आठ ऐसी बातें दी गईं हैं जिनका आपके बच्चे को कभी सामना नहीं करना चाहिए।

शिशु के साथ आपको कौन सा व्यवहार नहीं करना चाहिए

शिशु को अकेला छोड़ना

शिशु को अकेला छोड़ना

सबसे पहले, अपने शिशु को बिस्तर पर, पालने में, चेंजिंग स्टेशन या किसी दूसरे कमरे में अकेला न छोड़ें। किसी भी शिशु को कभी भी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। रोना एक तरह से संवाद का माध्यम है। अगर आपका बच्चा रोता है,
तो इसका मतलब है उसे कुछ चाहिए: भूख लगी है या बदलना है, कुछ चुभ रहा है,या और कुछ नहीं तो बच्चा अपनी माँ को याद कर रहा है।
कुछ लोग कहते हैं, बच्चे को आज़ाद रहने की आदत पड़नी चाहिए। लेकिन यह आदत वह बाद में बड़े होकर सीख सकता है।

जैसा सभी स्तनधारियों के साथ होता है, एक बच्चा अपनी माँ के सानिध्य और देखभाल पर निर्भर करता है। माँ के गर्भ में 9 महीने रहने के बाद, जहाँ माँ की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं था, बच्चे माँ का साथ पाने के लिए ही रोते हैं।

2. स्तनपान कराने का कार्यक्रम

हालाँकि इसमें थोड़ी मुश्किलें हैं, लेकिन अगर आपने स्तनपान कराने का निर्णय ले लिया है, तो उस पल की खुशी का बयान करना मुश्किल है जब दूध पीते समय बच्चा आपकी ओर देखता है। बधाई!

स्तनपान कराने का कोई कार्यक्रम नहीं होना चाहिए, बल्कि यह बच्चे की जरूरत के अनुसार होना चाहिए। मिल्क फ़ार्मूला, बच्चे को हर तीन घंटे बाद देना चाहिए।

एक बच्चे को भूख या प्यास लगने पर ही दूध की जरूरत हो यह जरूरी नहीं. इसके अलावा, यह माँ से जुड़ने का एकमात्र तरीका भी है, उससे आराम और प्यार पाने के लिए।

3. शिशु को रोने के लिए अकेला छोड़ देना

ऐसी दादी या आंटियाँ हमेशा रहती हैं जो आपको बताती हैं कि बच्चे को ट्रेनिंग देने के लिए पालने में अकेला छोड़ देना चाहिए। ज़्यादा होशियार लोग तो यह भी कहेंगे कि बच्चा जान-बूझकर आपसे काम निकलवाने के लिए ऐसा करता है।

मगर ऐसी हरकतें बड़े करते हैं, नन्हे शिशु नहीं। सवाल आपको खुद से करना है, वह है: 9 महीने गर्भ में रखने के बाद क्या मैं उसे अकेला रोने के लिए छोड़ दूँ ?

अगर एक रोते हुए बच्चे पर ध्यान न दिया गया तो वह हार कर रोना बंद कर देगा क्योंकि वह कुछ समझ जाएगा: कि आपको यह चिंता ही नहीं है कि उसे क्या चाहिए।

शिशु अपनी बात रोकर ही बता सकता है; अगर वह रो रहा है तो ज़ाहिर है वह आपसे कुछ कहना चाहता है।

4. बच्चे को सोने के लिए अकेला छोड़ना

शिशु को अकेला छोड़ना

बच्चों और बड़ों के सोने में फ़र्क होता है। हर दो या तीन घंटों के बाद बच्चा जागकर अपनी माँ को देखता है और तसल्ली करके फिर सो जाता है। बच्चे को सोना नहीं सिखाया जा सकता। वह अपने स्वाभाविक तरीके से सोता है।

अपने आप सोने की आदत उन्हें समय के साथ बडे़ होने पर पड़ती है। अगर आप अपने बच्चे के साथ एक ही बिस्तर पर सोने में सहज नहीं हो पातीं, तो उसका पालना नज़दीक में ही रख लें ताकि ज़रूरत पड़ने पर पास ही रहें। ऐसा करने से आपको रात में बार-बार नहीं उठना पड़ेगा।

5. बच्चे को ज़ोर ज़ोर से हिलाना

हमें यह कहना ही पड़ता है: रात में जब बच्चा जोर-जोर से रोने लगता है और कोई यह नहीं समझ पाता कि क्या करें या क्या हुआ है, तो आप बड़ी असहाय महसूस करती हैं। जो पेरेंट्स कहते हैं कि रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए उन्हें उसे ज़ोर-ज़ोर से हिलाने की इच्छा कभी नहीं हुई वे शायद झूठ बोलते हैं।

ज़ोर-ज़ोर से हिलाने से बच्चा शांत नहीं होता। बल्कि इससे वह और डरकर ज़्यादा ज़ोर से रोने लग सकता है।

इसके अलावा, आप उसके कोमल शरीर को चोट पहुँचा सकती हैं। खूब प्यार करने और बाँहों में भर लेने से उसे आराम और शांति मिलती है और वह सो जाता है।

6. बाँहों में न लेना

माँ की बाँहों में रहने की सुरक्षा से बच्चों को आराम मिलता है। अगर बच्चे को नियमित रूप से माँ की बाँहों में आराम नहीं मिलता, तो चुप होने में और वैसे भी आम तौर पर उसे मुश्किल होती है।

तीन घंटे अपनी माँ से दूर रहने पर, बच्चे के दर्द का एहसास जागता है। नतीजा होता है तनाव और दीर्घकालीन भावनात्मक ज़ख्म।

बच्चे अपना काम खुद नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें अपनी माँ का ज़्यादा से ज़्यादा साथ चाहिए। उनकी देखभाल और सुरक्षा करनी होती है, और जो चीज़ चाहिए देनी होती है। बच्चे के साथ शुरू से ही कम संपर्क रखने से उसके खुशी के हार्मोन बनना कम हो जाते हैं। ये हॉर्मोन हैं, सेरोटोनिन, एंडोजिनस ओपियोइड्स और ऑक्सीटॉसिन।

7. उन्हें दंड देना

सज़ा मिलने पर बच्चा उस पर अविश्वास करने लगता है जो उसकी देखभाल करता है। इसके अलावा, वह अपनी ज़रूरतों को दबाना सीख लेता है, अपने आसपास की दुनिया को देखकर कुछ करने की इच्छा खो देता है, अपना आत्मविश्वास खो देता है। वह अपनी भावनाओं को कम आंकता है और आखिर में दर्द और तनाव को अपना नसीब मानने लगता है।

एक ऐसा खुश रहने वाला बच्चा बनाने के लिए जिसे पता होता है कि उसकी ज़रूरतें पूरी होंगी,आपको धैर्य रखना होगा। हाँ, कभी कभी सब्र टूट सकता है। लेकिन याद रहे, बच्चे की देखभाल करना बच्चों का खेल नहीं है! और यह भी कि बच्चे की सही देखभाल बड़ों के धैर्य से ही संभव होती है।

याद रहे, जब प्यार करने वाले लोग अपनी नकारात्मक भावनाओं को नियंत्रण में रखते हैं, तो वे भविष्य के सहिष्णु और सहकार्य करने वाले वयस्क बनाते हैं।

8. अपनी सहज प्रवृत्तियों को नज़रअंदाज़ करना

इस बारे में तरह-तरह के विचार हैं, विशेषज्ञों से लेकर माँओं तक। हालाँकि दूसरी महिलाओं और माँओ से शुरू में काफ़ी मदद मिलती है, लेकिन जब दिल कुछ और करने को कहे, तो उसकी सुनिए।

मातृत्व एक औरत को उसके स्वभाव और उसकी मूल भावनाओं से फिर से जोड़ देता है।

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