गौर कीजिये: ये लक्षण आपके बच्चे को पढ़ाई-लिखाई में हो रही मुश्किलों के संकेत हो सकते हैं

पढ़ाई-लिखाई में आने वाली परेशानियां कम उम्र में ही सामने आ जाती हैं। अक्सर बच्चे को इन कठिनाइयों के साथ जीने की आदत डालनी पड़ जाती है। जल्द से जल्द उनकी पहचान कर लेना बेहद ज़रूरी होता है। इस अवस्था के कुछ ख़ास लक्षणों के बारे में जानें।
गौर कीजिये: ये लक्षण आपके बच्चे को पढ़ाई-लिखाई में हो रही मुश्किलों के संकेत हो सकते हैं

आखिरी अपडेट: 18 फ़रवरी, 2019

एंजेलिका चार साल की है।  उसने अभी कुछ दिन पहले ही स्कूल जाना शुरू किया है। क्लास में बाकी बच्चों से न ही वह बात करती है और न ही घुलती-मिलती है। वह अपने टीचर की बात भी नहीं मानती। पढ़ाई-लिखाई में एंजेलिका को आने वाली परेशानियों को ध्यान में रखते हुए स्कूल के मनोवैज्ञानिक टीचर ने उसके माता-पिता के साथ एक मीटिंग बुलाई।

कुछ ही दिनों में एंजेलिका के माता-पिता को तीन बार स्कूल बुलाया जा चुका था। घर पर एंजेलिका ढेर सारी बातें भी करती है और अपने मम्मी-पापा के साथ पढ़ने में रुचि भी लेती है। लेकिन स्कूल आकर कहानी कुछ और ही हो जाती है।

बढ़ते दवाब के चलते एंजेलिका के माता-पिता उसे किसी न्यूरो-पीडियाट्रीशीएन के पास ले गए। उसकी जांच करने पर डॉक्टर ने कहा कि वह बिलकुल ठीक है। बहुत से बच्चों की तरह, एंजेलिका बस अपने सहपाठियों से थोड़ी अलग है।

फिर कुछ ही दिनों में एक “चमत्कार” हो जाता है। एंजेलिका लोगों से घुलना-मिलना शुरू कर देती है, पढ़ाई-लिखाई में दिलचस्पी लेने लगती है और अपने टीचर और क्लासमेट से बातचीत शुरू कर देती है।

हर बच्चा अपनी तरह से सीखता है

हर बच्चा पढ़ाई-लिखाई में एक-जैसा नहीं होता

यह कहानी सिर्फ़ एंजेलिका की ही नहीं है। यह कई माता-पिता, बच्चों, अध्यापकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कहानी है। हालांकि यह अक्सर सुनने में आता है कि “हर बच्चा अपने समय और अपनी गति के नुसार ही सीखता है,” कई बार चिंता की वजह से हमें ऐसी परेशानियां भी दिखने लगती हैं, जो दरअसल होती ही नहीं

स्कूल शुरू होने पर कई तरह की परेशानियाँ खड़ी हो जाती हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर वक़्त के साथ सुलझाई जा सकती हैं।

बच्चों को नर्सरी में बहुत मज़ा आता है। वे खेल-कूद के माध्यम से काफ़ी कुछ सीखते हैं। यहाँ टीचरों और बच्चों का रिश्ता भी ज़्यादा करीबी और निजी होता है।

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई जटिल होती जाती है, उनपर काम का दवाब बढ़ जाता है और उनके स्कूली रिश्ते एक नए रंग में ढल जाते हैं।

बच्चा अपनी काबिलियत और कमज़ोरियों के प्रति ज्यादा जागरूक हो जाता है। कुछ बच्चों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन कुछ बच्चों के लिए यह कोई छोटी बात नहीं होती।

पढ़ाई-लिखाई में आने वाली कठिनाइयों के बारे में पता कब चलता है?

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि पढ़ाई-लिखाई में आने वाली परेशानियों का पता जितनी जल्दी लग जाए, उतना ही अच्छा होता है। लेकिन सच तो यह है कि बच्चों में की जाने वाली डायग्नोसिस के नतीजे विश्वसनीय नहीं होते।

बच्चे को पढ़ाई-लिखाई में आने वाली परेशानियों की डायग्नोसिस उसके तीसरी कक्षा (7-8 वर्ष की उम्र) में पहुँचने से पहले करवाना उचित नहीं होता

पढ़ाई-लिखाई में आने वाली मुश्किलों से जानकारी को प्रोसेस करने की उसकी क्षमता प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, कोई बच्चा पढ़ने-लिखने में बाकी बच्चों से पीछे हो सकता है। अक्सर उसे मैथ में परेशानी का सामना भी करना पड़ता है। उसे यह तो समझ आ जाता है कि वह क्या पढ़ रहा है, लेकिन सही शब्दों में वह उसे बयान नहीं कर पाता।

इससे न सिर्फ़ स्कूल में उसका प्रदर्शन प्रभावित होता है, बल्कि बाकी लोगों के साथ उसके संबंधों पर भी असर पड़ता है।

पढ़ाई-लिखाई में आने वाली कठिनाइयों के शुरुआती लक्षण

पढ़ाई-लिखाई में आने वाली समस्याएं

5 साल से कम उम्र के बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में आने वाली मुश्किलों के लक्षणों की हमने एक सूची बनाई है। लेकिन हम इस बात पर ज़ोर देना चाहेंगे कि आप निराश न हों। आपको धैर्यपूर्वक अपने बच्चे पर नज़र रखकर यह देखना चाहिए कि उसका विकास किस दिशा में, कितनी तेज़ी से हो रहा है। वे लक्षण इस प्रकार हैं:

  • लिखने, फाड़ने, चलने, काटने, बटन बंद करने, ज़िप लगाने या जूते के फीते बाँधने जैसी मोटर समस्याएं
  • उन्हें आसान निर्देश समझकर उनका पालन करने में परेशानी आती है।
  • वे रुक-रुककर बोलते हैं। उनका उच्चारण स्पष्ट नहीं होता। उन्हें नए शब्द सीखने में मुश्किल पेश आती है।
  • उनके लिए पढ़ना, संख्या, वर्णमाला, हफ़्ते के दिन, रंगों और जियोमेट्रिक आकारों को समझना मुश्किल होता है।
  • उन्हें अपना ध्यान केन्द्रित करने या किसी चीज़ पर ध्यान देने में कठिनाई आती है
  • स्कूल, परिवार या अन्य सामाजिक गतिविधियाँ करते वक़्त वे निराश-हताश रहते हैं।

बड़े बच्चों में पढ़ाई-लिखाई में आने वाली परेशानियों के सूचक

  • अपनी पढ़ाई के बारे में बात करने से बचना और हर काम में ज़रूरत से ज़्यादा समय लेना।
  • वे आसानी से ऊब जाते हैं और स्कूल में कोई रुचि नहीं लेते।
  • स्कूल में उनका बर्ताव खराब या हिंसक होता है।
  • अपनी भावनाओं को पहचानकर उन्हें व्यक्त करने वाली परेशानियों के लक्षण उनमें दिखाई पड़ते हैं।
  • उन्हें सोने और खाने-पीने में मुश्किल आती है।

पढ़ाई-लिखाई की समस्याओं से जूझते बच्चे

पढ़ाई-लिखाई की समस्याओं वाले बच्चे

आमतौर पर देखा गया है, जिन बच्चों को पढ़ाई-लिखाई में मुश्किल आती है, उनका बौद्धिक स्तर सामान्य या सामान्य से ऊपर होता है। लेकिन उन्हें समस्या अपनी जानकारी को व्यक्त करने में आती है। कुछ विषयों को सीखने में आने वाली समस्याओं के कारण वे अक्सर निराश और चिड़चिड़े रहते हैं।

ये भावनाएं उनके आत्मविश्वास पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। उन्हें डिप्रेशन भी हो सकता है, क्योंकि यह जानने के बावजूद कि वे क्या हासिल करना, कहना, लिखना या करना चाहते हैं, उनके लिए वास्तव में वैसा कर पाना काफ़ी मुश्किल होता है।

कुछ मामलों में पढ़ाई-लिखाई में परेशानियों का सामना करने वाले बच्चों में डिस्लेक्सिया (dyslexia), डिसकैल्कुलिया (dyscalculia) या दोनों ही रोगों जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो जाती हैं। इससे उनके सटीक निदान में मदद मिलती है। उन्हें ध्यान देने से संबंधित परेशानियां भी आ सकती हैं, लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल भी नहीं है कि वे अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर से ग्रस्त हैं।

अपने बच्चे की मदद कैसे करें?

  • इस बात को स्वीकार कर लें कि पढ़ाई-लिखाई में आने वाली समस्याएं ज़िन्दगी भर उनके साथ ही रहेंगी। लेकिन आप इस बात की फ़िक्र न करें। सही मदद मिलने पर आपका बच्चा पढ़ेगा-लिखेगा भी और बड़ा होकर एक चुस्त-दुरुस्त इंसान भी बनेगा।
  • आपके बच्चे के टीचर भी उसके लक्षणों की पहचान करने में मदद कर उसे सिखाने के लिए एक उचित माहौल तैयार कर सकते हैं। हाँ, वह उसकी समस्या का निदान नहीं कर सकती हैं।
  • सही डायग्नोसिस और वक़्त रहते इलाज करवा लेने से बच्चे के शैक्षिक जीवन पर अच्छा असर पड़ेगा।
  •  पढ़ाई-लिखाई में आने वाली परेशानियों की जांच करने वाले टेस्ट विशेषज्ञों द्वारा किए जाते हैं: ये मनोवैज्ञानिक, चाइल्ड न्यूरोसाईकोलॉजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक होते हैं।
  • पढ़ने-लिखने में आने वाली मुश्किलों के बावजूद बच्चे सीखते ज़रूर हैं। आपको बस उनकी क्षमताओं और पसंद-नापसंद का ध्यान रखना चाहिए। इससे उनका आत्मविश्वास विकसित होता है।
  • ऐसे बच्चों को डांटने या सज़ा देने का कोई फायदा नहीं होगा। ऐसा करने से बात बिगड़ भी सकती है।
  • अगर आपका बच्चा अपनी कमजोरियों के कारण बदमिज़ाज है या रोने लगता है तो उसकी हौसला आफज़ाई करें। उसे बताएं, आप उससे कितना प्यार करते हैं और इस बात का ध्यान रखें कि उन्हें छोटी-छोटी चीज़ें करने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है।

मम्मी-पापा के लिए

पढ़ाई-लिखाई में परेशानियों का सामना करने वाले बच्चे का लालन-पालन तनावपूर्ण होता है। अगर आपको मदद या मनोवैज्ञानिक सहायता की ज़रूरत पड़ती है तो उसे लेने में हिचकिचाएं नहीं। मम्मी-पापा को भला-चंगा देखकर आपके बच्चे को भी फायदा होगा।

कृपया अपने बच्चे की, जिसे पढ़ाई-लिखाई में परेशानियाँ आती हैं, तुलना किसी ऐसे बच्चे से न करें जिसमें ये समस्याएं नहीं हैं। उसके भाई-बहन से तुलना तो बिलकुल भी न करें। इससे आपके बच्चे का ही भला होगा।



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यह पाठ केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए प्रदान किया जाता है और किसी पेशेवर के साथ परामर्श की जगह नहीं लेता है। संदेह होने पर, अपने विशेषज्ञ से परामर्श करें।