गर्भाशय के फाइब्रॉइड से जुड़े 5 तथ्य: हर महिला को इन्हें जानना जरूरी है

01 जून, 2018
वैसे तो गर्भाशय के फाइब्रॉइड यानी यूटरिन फाइब्रॉइड किसी खतरे की ओर संकेत नहीं करते हैं। लेकिन हमारी यही सलाह है कि आप सही समय पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलकर इसके लक्षणों को समझें और ज़रूरत के अनुसार इलाज करवाएँ।

गर्भाशय यानि यूटरस की सतह पर असामान्य रूप से मस्कुलर टिश्यू के बढ़ने को गर्भाशय के फाइब्रॉइड या यूटरिन फाइब्रॉइड के नाम से जाना जाता है।

इनका होना खतरे की ओर इशारा तो करता है, लेकिन इनमें से केवल 0.5% ही कैंसरजन्य कोशिकाओं में विकसित होते है।

इसका मतलब है कि इनके होने से परेशानी तो होती है लेकिन इनसे कैंसर होने का खतरा कम ही होता है।

इस पर सही समय पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है। नहीं तो ये प्रजनन तंत्र और हॉर्मोन से जुडी परेशानियाँ खड़ी कर सकते हैं।

स्पैनिश सोसाइटी ऑफ गायनकोलॉजी एंड ऑब्स्टेट्रिक्स (SEGO) का ऐसा मानना है कि लगभग 70% महिलाओं को अपने जीवन में कभी न कभी इस परेशानी का सामना करना पड़ता है।

हम चाहते है कि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएँ गर्भाशय के फाइब्रॉइड के विकास के बारे में जाने। इस लक्ष्य के साथ हम इस समस्या से जुड़े 5 महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में बात करेंगे।

थोडा समय दें और इन्हें समझने का प्रयास करें!

1. गर्भाशय के फाइब्रॉइड क्या हैं?

ट्यूमर का विकसित होना

यूटरिन फाइब्रॉइड ऐसे ट्यूमर होते हैं जो घातक नहीं हैं। आम तौर पर ये 20 साल की उम्र के बाद ही दिखने शुरू होते हैं।

  • लायोमायोमास या फाइब्रोमायोमास के नाम से भी जाने वाले, ये छोटे गोल टिश्यू का समूह होते हैं।
  • इनका आकार बहुत छोटे से बहुत बड़ा तक हो सकता है। 
  • इनकी मौजूदगी जेनेटिक और हार्मोनल कारणों से संबंधित है
  • दुर्भाग्यवश ये महिलाओं में बांझपन का कारण बनते हैं।

2. गर्भाशय के फाइब्रॉइड कितने प्रकार के होते हैं?

गर्भाशय के फाइब्रॉइड 4 प्रकार के होते हैं। लेकिन इनकी किस्म या प्रकार इस बात पर निर्भर करती है कि ये गर्भाशय में कहाँ स्थित हैं।

सब म्यूकोसल फाइब्रॉइड

  • ये मायोमेट्रियम के ठीक नीचे बनते हैं। मायोमेट्रियम वो परत होती है जो गर्भाशय की अंदरूनी दीवार की रक्षा करती है।
  • यह गर्भाशय की अंदरूनी कैविटी में फैल सकते है।

सबसेरोसल फाइब्रॉइड

  • इस तरह का समूह सीरस मेम्ब्रेन के नीचे पाया जाता है। यह मेम्ब्रेन गर्भाशय के बाहरी हिस्से को कवर करती है।
  • इसकी वजह से गर्भाशय में गाँठदार बढ़त होने की आशंका होती है।

पेडनक्युलेटेड फाइब्रॉइड

  • ये फाइब्रॉइड सब-सीरस प्रकार के होते हैं। ये गर्भाशय से अलग होकर एक पेडिकल स्ट्रैंड से जुड़े रहते हैं।
  • इस प्रकार के ट्यूमर गर्भाशय की अंदरूनी कैविटी में या उसके बाहर बढ़ सकते हैं।

 इंट्राम्यूरल फाइब्रॉइड

  • ये गर्भाशय की मस्कुलर वाल पर बढ़ते हैं। जब ये ज़रूरत से ज़्यादा बड़े हो जाते हैं, तब बाहरी और आंतरिक दीवार को बिगाड़ सकते हैं।

3. गर्भाशय के फाइब्रॉइड के क्या लक्षण होते हैं?

यूटरिन फाइब्रॉएड के लक्षण

सामान्य रूप से हमे निम्न लक्षणों से इनके होने का संकेत मिल सकता है।

  • भारी मात्रा में और अनियमित मासिक धर्म रक्तस्राव
  • निचले पेट में सूजन और दर्द
  • अचानक वजन बढ़ना
  • गर्भवती होने में कठिनाई
  • गर्भधारण और जन्म में जोखिम होना
  • दर्दनाक संभोग
  • मूत्र की आदतों में परिवर्तन
  • पीठ दर्द

4. गर्भाशय के फाइब्रॉइड किस प्रकार फर्टिलिटी को प्रभावित करते हैं?

इस परेशानी के कारण महिलाओं को गर्भ धारण करने में दिक्कत आती है।

जब ट्यूमर का आकार बढ़ जाता है, तो यह गर्भ धारण में समस्या पैदा करने के साथ-साथ गर्भवती होने पर परेशानी भी खड़ा कर सकता है।

जब एस्ट्रोजेन का स्तर बढ़ा हुआ होता है तब फाइब्रॉइड भी बढ़ने शुरू हो जाते हैं। चूंकि गर्भावस्था के दौरान प्रोजेस्टेरोन भारी मात्रा में उपलब्ध होता है, इसलिए इस दौरान फर्टिलिटी से जुड़ा इलाज करा पाना संभव होता है।

हालांकि, आपको यह ध्यान में रखना होगा कि इसकी उपस्थिति गर्भावस्था के दौरान गर्भपात का खतरा बढ़ाती है।

5. गर्भाशय के फाइब्रॉइड के लिए क्या इलाज उपलब्ध है

यूटरिन फाइब्रॉएड के लिए उपलब्ध उपचार

अधिकतर महिलाओं को यही लगता है कि वे सिर्फ ऑपरेशन या सर्जरी से ही ठीक हो सकती हैं।

लेकिन अगर फाइब्रॉइड का आकार छोटा हो तो ऑपरेशन या सर्जरी कराना ज़रूरी नहीं है।

कई बार तो ये केवल डॉक्टर द्वारा सुझाई गई दवाओं से ही ठीक हो सकते हैं।

अगर दवाएँ इन पर असर न करें तो इन्हें शरीर से निकाला भी जा सकता है।

  • ऐसे समय में मायोमेक्टॉमी की जाती है, जो गर्भाशय को प्रभावित किए बिना फाइब्रॉइड को हटा देती है।
  • जब समस्या बड़ी होती है, तो हिस्टरेक्टॉमी की जाती है, जो गर्भाशय को पूरी तरह से हटा देती है।

इस लेख का सार यही है कि आपको सभी लक्षणों की ओर ध्यान देना होगा। साथ ही में नियमित रूप से डॉक्टर से जाँच करवाते रहें।

हम आपको यही सलाह देंगे कि सावधानी बरतने में ही भलाई है।

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