अपने बच्चों के सामने झगड़ने का नतीज़ा

06 अगस्त, 2018
अपने बच्चों के सामने लड़ाई-झगड़ा करना उन सबसे बुरी चीजों में है जो हम एक पैरेंट्स के रूप में कर सकते हैं। इसका नतीजा बच्चों में असुरक्षा की भावना होती है। इसलिये हमें यह समझना बहुत जरूरी है कि हम कर क्या रहे हैं।

आर्गुमेंट हर रिश्ते का हिस्सा है, कई बार तो समस्या को सुलझाने के लिये यह ज़रूरी होता है। फिर भी हमें किसी भी बहस को लडाई-झगड़े में बदलने रोकना चाहिये। सबसे जरूरी यह है कि: हमें अपने बच्चों के सामने झगड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

जो बच्चे हाथा-पाई और वाद-विवाद होते देखते हैं, उन्हें एंग्जायटी का अनुभव करते हैं, जो बाद में गुस्सा, उदासी या डर में बदल जाती है। अगर उस समय वे ज्यादा छोटे हैं, तो मनोवैज्ञानिक असर और भी ज्यादा बुरे होते हैं।

अपने बच्चों के सामने झगड़ने का परिणाम

1. शिशु का अवचेतन मन

बच्चों के सामने झगड़ने का नतीज़ा: डरा हुआ बच्चा

नवजात शिशु अपने आसपास के लोगों के हाव-भाव को अवचेतन रूप से अपने दिमाग में दर्ज करने में सक्षम होते हैं, इनमें लोगों की आवाजें और इशारे भी शामिल होते हैं। ठीक वैसे ही जैसे वे अपने आसपास उनके प्यार को महसूस करते हैं। जब स्थिति तनावपूर्ण होती है, अगर आपकी आवाज़ में गुस्सा होता है और अगर आपका चेहरा आक्रामक है तो वे उसे भी महसूस कर सकते हैं।

2. उनका भावनात्मक विकास

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि झगड़ा कितना “मामूली” है, एक तनावपूर्ण पारिवारिक माहौल में पलने-बढ़ने से बच्चे में गहरे भावनात्मक जख्म पैदा हो सकते हैं। क्योंकि ऐसे माहौल में चिंता और आत्म-विश्वास में कमी जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिलता है। एक शांत माहौल, जहां बड़ों के झगड़ों में बच्चे शामिल नहीं होते हैं, उनके अच्छे विकास में मदद करता है।

3. प्रीस्कूल

इस उम्र में, भाषाई दृष्टि से बच्चे पूरी तरह से विकसित नहीं रहते है, और वे बिना कहे ही अपनी बात रखने की कोशिश करते हैं। इसीलिये, हो सकता है, आपके आपसी लड़ाई-झगड़े के बाद वे रोने लगें या गुस्से से चीजें इधर-उधर फेंकने लगे।

प्रीस्कूल चरण में बच्चे अभी इन झगड़ों की वजह नहीं समझ पाते हैं। उनकी ईगोसेन्ट्रिक सोच की वजह से उन्हें लगता है, वे ही लड़ाई की जड़ हैं। नतीजा यह होता है कि वे अपने मम्मी-पापा के आपसी झगड़े के लिए खुद को दोषी मानने लगते हैं।

हर बच्चे के रिएक्शन अलग-अलग होते हैं। कुछ ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कोई समस्या ही नहीं है। लेकिन कुछ इतनी बुरी तरह सहम जाते हैं जैसे कुछ डरावना हो रहा है। जब तक उन्हें सुरक्षा का अहसास नहीं होता तब तक वे खुद को दुनिया से अलग-थलग कर लेते हैं।

आम तौर पर वे पर अपने सोने या खाने के तरीकों में बदलाव करके भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। वे अपने विकास के पिछले स्तर में वापस भी जा सकते हैं जैसे बिस्तर में पेशाब करना आदि। प्रीस्कूल स्टेज के ऐसे बच्चे चिड़चिड़े या आक्रामक हो सकते हैं।

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4. प्राथमिक स्कूल के बच्चे

बच्चों के सामने झगड़ने का नतीज़ा: साथ में कैंची -1

इस उम्र में, बच्चों को समझ आने लग जाता है कि उनके आसपास क्या चल रहा है। अपने पैरेंट्स को लड़ता देखकर हो सकता है वे चौंक जायें या परेशान हो जायें। हमने पहले भी बताया है, इसके लिये वे खुद को दोषी मानते हैं, और उन्हें लगता है कि उनको किसी एक की तरफ हो जाना चाहिये। लड़कियां अपनी मां की तरफ हो जाती हैं, जबकि लड़के अपने पिता की तरफ हो जाते हैं।

“मामूली” लेकिन बार-बार झगड़ने का उन पर असर

आम तौर पर इस तरह की लड़ाई एक अस्थिर परिवार माहौल पैदा करती है। इस तरह के माहौल में बच्चा समझने लगता है कि छोटी-छोटी चीजें बहुत बड़ी मुसीबत पैदा कर सकती है।

इस कारण बच्चे को लग सकता है कि उसे ही स्थिति को काबू में करना पड़ेगा। इतना ही नहीं, कोई समस्या न हो इसके लिए वे अपनी असली जरूरतें छिपाने लगते हैं।

बच्चे और बेईज्जती

आपको कभी भी अपने बच्चों का इस्तेमाल उनके पिता या मां से मुकाबला करने या उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं करना चाहिए, खासकर जब आप अलग-अलग हो चुके हैं। यह बहुत जरूरी है कि आप आपस में समझौता करें कि जब रात में बच्चे सो रहे हों, तो किसी भी तरह का  लड़ाई-झगड़ा नहीं होगा। लड़ाई-झगड़े सभी परिवारों में होते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अपने बच्चे को ये दिखाने के लिए करें कि हर कोई अलग होता है। यह आप भी चाहते हैं कि आपका बच्चा खुशहाल परिवार में पले-बढ़े।

बच्चों के आसपास कोई लड़ाई नहीं

बच्चों के सामने झगड़ने का नतीज़ा: लड़ाई

कभी भी लड़ाई-झगड़े तभी होने चाहिए जब बच्चे आस-पास मौजूद न हों। उन्हें पता चल जायेगा कि उनके मम्मी-पापा आपस में लड़े हैं, लेकिन कम से कम वे खुद को लड़ाई का हिस्सा नहीं समझेंगे। बच्चे खासकर छोटे बच्चे, इस काबिल नहीं होते हैं कि शब्दों के पीछे का सही मतलब निकाल सकें; वे जो सुनते हैं उसी पर भरोसा करने लगते हैं।

अगर वे अपने पैरेंट्स को यह कहते सुनते हैं; “बस! बहुत हो गया” “मैं तुमसे तंग आ गया हूँ!” “मैं तुम्हें दोबारा नहीं देखना चाहता!” तो न केवल उन्हें चोट पहुंचेगी, बल्कि वे असुरक्षित भी महसूस करेंगे क्योंकि उनके मम्मी-पापा अलग हो सकते हैं।

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पारिवारिक समाधान

अगर आपको दिक्कते आ रही हैं, तो एक कपल (जोड़े) के रूप में थेरेपी लें इससे आपके कम्युनिकेशन में सुधार आयेगा। फैमिली थेरेपी फायदेमंद है लेकिन जब बच्चे गलत बर्ताव करने लगे या उसमें मनोवैज्ञानिक समस्या के लक्षण दिखने लगे तो तब आको प्रोफेशनल तरीके से मदद लेने की जरुरत है। परिवार के सदस्यों के बीच पॉजिटिव रिलेशनशिप को बढ़ावा देने के लिये थेरेपी बहुत कारगर साबित हो सकती है।

अपने बच्चों के बात करें

कभी-कभी अपने बच्चों के सामने लड़ाई को टाल पाना नामुमकिन हो जाता है। ऐसे मामलों में, उन्हें यह समझाना जरूरी है कि सभी लोग लड़ते हैं, यहां तक कि जो लोग एक दूसरे से प्यार करते हैं, वे भी। इस मौके का इस्तेमाल उन्हें यह समझाने के लिए करें कि बहस का मतलब ये नहीं है कि आप एक-दूसरे की फ़िक्र नहीं करते हैं।

अगर झगड़ा सुलझ जाये, तो आप साथ मिलकर पारिवारिक गतिविधियों का मजा ले सकते हैं; लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो झूठा दिखावा ना करें, क्योंकि बच्चे तनाव को महसूस कर सकते हैं।

मॉडल के रूप में माता-पिता

बच्चों के सामने झगड़ने का नतीज़ा: पेरेंट्स और बच्चा

ध्यान रखें कि पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए एक रोल मॉडल होते हैं। जब वे अपने माता-पिता को  एक-दूसरे के साथ हाथा-पाई या वाद-विवाद या किसी और तरीके का बुरा बर्ताव करते हुये देखते हैं, तो उनमें भी एक गहरी इच्छा पैदा होती है जिससे उनकी पर्सनालिटी पर बुरा असर पड़ सकता है। यह उनके दोस्तों और क्लासमेट के साथ उनके रिश्तों पर भी असर डालता है।

उन्हें सिखाएं कि अगर किसी चीज को लेकर लोगों के अलग नजरिये और अलग राय हैं तो भी आप हमेशा अच्छे शब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं। चलिये बिना पागल बने, बिना चिल्लाये, या गलत बातें कहे, सहनशील और सम्मानपूर्ण माहौल बनायें।

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