अकेलेपन से नहीं डरने वालों की पर्सनालिटी कैसी होती है?

जुलाई 15, 2018
हो सकता है, यह बात थोड़ी सी अजीब लगे, लेकिन दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अकेलेपन से डरते नहीं हैं। वे अलग और खास तरीके से उन पलों का मजा लेते हैं जो उन्हें खुद के लिये मिले हैं।

अकेलेपन के बारे में हममें से ज्यादातर लोगों को यह बताया जाता है कि अकेला होना एक असफलता है, यहाँ तक कि अगर कोई अकेले बैठकर कॉफी पी रहा हो या घूम-फिर रहा हो तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे वह कुछ “अजीब” आदमी हों।

इन बातों ने बहुत नुकसान पहुँचाया है, कई लोगों को घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने, और कई चीजों के लिये दूसरे लोगों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर कर दिया है

आज हम उन लोगों की पर्सनालिटी के बारे में बात करेंगे जो अकेलेपन से बिलकुल भी नहीं घबराते हैं। आखिर, उनके आस-पास भी कई ऐसे मिथक हैं जिनमें जरा भी सच्चाई नहीं होती है।

अकेलेपन से नहीं डरने वाले असामाजिक नहीं होते

ट्रेवलिंग करती हुयी औरत

यह एक भ्रम है कि जो लोग अकेले होने से नहीं डरते हैं वे असामाजिक होते हैं।

वे अकेले में समय बिताना पसंद करते हैं, किसी और को साथ लिये बिना ही ट्रिप पर जाते हैं, और बस इसी बात पर हमारे समाज में उन्हें “असामाजिक आदमी” होने का दर्जा दे दिया जाता है।

हालांकि, सच्चाई से आगे कुछ भी नहीं होता है। सच बात यह है कि जो लोग अकेलेपन से नहीं डरते वे खुश रहने के लिए कभी किसी पर निर्भर नहीं होते हैं

फिर भी, इसका यह मतलब नहीं है कि उनके पास दोस्त नहीं हैं या वे नए लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते हैं।

वे दूसरों के साथ घुलने-मिलने का मजा भी लेते हैं; इसके अलावा, वे काफी अच्छे रिलेशनशिप भी बनाते हैं क्योंकि वे इसके लिये जागरूक होते हैं, और यही कारण है कि किसी और को उन्हें पकड़े रखने की ज़रूरत नहीं होती है।

इस तरह, वे दूसरों को खुश करने की कोशिश नहीं करते हैं। वे खुद को वही दिखाते हैं जो कि वे हैं, ना कुछ कम ना कुछ ज्यादा।

यही चीज उन्हें दूसरों की नज़रों में और ज्यादा आकर्षक बना देती है, क्योंकि ये वे लोग हैं जो ज्यादा सुरक्षित हैं और जो अपनी लाइफ-स्टाइल (जीवनशैली) से संतुष्ट हैं। वे काफी हंसमुख, शरारती या ताने मारने वाले भी हो सकते हैं। लेकिन वो ऐसे हो होते हैं!

दिलचस्प बात तो ये है कि, जो लोग वैसा नहीं कर पाते, जैसा वे करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें दूसरों की मंजूरी चाहिये होती है, उन्हें ये नहीं पता कि जब वे ऐसा सोचना छोड़ देंगे, तो दूसरे लोग उन्हें स्वीकार करेंगे, चाहे वो जैसे भी हों।

वे नए अनुभवों को आजमाने से डरते नहीं हैं

रेत में पैरो के निशान

जो लोग अकेलेपन से नहीं डरते हैं वे एक पार्टनर, माता-पिता, या दोस्त से जुड़े रहने की मजबूरी से आजाद हो जाते हैं।

यही कारण है कि, वे अपने मन पसंद की जिंदगी जीने का मज़ा लेते हैं।

जो लोग खुश रहने के लिये दूसरों पर निर्भर रहते हैं या ये मानते हैं कि एक साथी का होना बहुत जरुरी है, उनके लिये ये कुछ ऐसा है जो उन्हें सुरक्षित महसूस करवाता है।

हालांकि, जो लोग अकेले रहने से डरते नहीं हैं वे जानते हैं कि सुरक्षा की भावना उनके अन्दर ही मौजूद है। वे कुछ नया पाने के लिए अपने इस सुरक्षित वातावरण को छोड़ने से डरते नहीं हैं।

उनकी यह सोच अद्भुत तरीके से उनकी पर्सनालिटी को निखारती है। यह उन्हें खुद के बारे में अच्छा महसूस करने, खुद को बेहतर तरीके से समझने और आगे बढ़ने में मदद करती है।

इसलिए, आपको ये जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिये कि जो लोग अकेलेपन से नहीं डरते हैं वे ज्यादा जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि वे अपनी खुद की ज़िम्मेदारी लिये होते हैं।

वे अपने जहाज के कप्तान खुद ही होते हैं।

एक साथी का होना ही केवल उनका लक्ष्य नहीं होता

स्त्री पक्षियों को आजाद करते हुये

कई सारे लोगों के लिए, एक पार्टनर का ना होना बहुत बड़ी परेशानी वाली बात हो सकती है। अगर किसी निश्चित उम्र में भी हमारे पास कोई पार्टनर नहीं होता है, तो हम ये मानने लगते हैं कि हम अपनी बाकी बची जिंदगी में भी अकेले ही रहेंगे।

इससे ऐसा लगता है कि हम केवल एक जोड़े के रूप में ही खुश रह सकते हैं। फिर भी, ये कुछ ऐसी बाते हैं जो अकेलेपन से नहीं डरने वाले लोग, किसी के साथ बिल्कुल भी शेयर नहीं करते हैं।

वे जानते हैं कि एक पार्टनर का होना अच्छी बात है, लेकिन वे इसके लिये कोई जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश नहीं करते हैं, बल्कि वे उस स्थिति को ही बेहतर बनाते हैं।

इस तरह, वे बजाय ऐसे आदमी को खोजने के जो उन्हें मनचाही खुशी दे सकता है, वे खुद को जानने और समझने में ज्यादा समय लगाते हैं।

अकेलापन बिल्कुल बुरा नहीं है। यह आपको अपने आप को बेहतर तरीके से जानने और उस बोझ को हटाने में मदद करता है जो आपको अच्छा महसूस करने और खुश होने के लिये दूसरों पर निर्भर बनाता है।

हम मानते हैं कि दूसरे लोग हमें ऐसी सुरक्षा देते हैं जो हमें “घर में होने” जैसा महसूस करता है। लेकिन क्या होगा अगर हम पहले से ही घर पर हैं?

  • Juan Díez Nicolás; María Morenos Páez (2015). La soledad en España (España). https://www.fundaciononce.es/sites/default/files/soledad_en_espana.pdf
  • Lena María Montero López; Juan José Sánchez Sosa (2001). La soledad como fenómeno psicológico: un análisis conceptual (Mexico). https://www.redalyc.org/pdf/582/58212404.pdf