एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम : बच्चों के छोड़ जाने पर जब घर को घेर लेता है अकेलापन

20 अक्टूबर, 2018
जब आपके बच्चे घर छोड़ देते हैं या फिर शादी करके अलग घर बसा लेते हैं तब आपको एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम या अकेलापन घेर लेता है। इसका सामना करना मुश्किल है लेकिन आप अच्छी तरह जानते हैं, इसी में उनकी भलाई है, यह जीवन का एक हिस्सा है।

अकेलापन बहुत कष्टकारी होता है। अगर आप कभी माता-पिता रहे हैं तो निश्चित रूप से आपने इस वास्तविकता का अनुभव किया होगा, उस समय, जब बच्चे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर छोड़ देते हैं। घर सूना हो जाता है।

इस दौरान आप जो अकेलापन और डर महसूस करते हैं उसे एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम (Empty Nest Syndrome) कहते हैं।

दरअसल, आपकी सारी भावनाएं आसपास होने वाली घटनाओं से प्रभावित होती हैं। आपकी भावनाओं पर सिर्फ़ आपके काम या पारिवारिक परिस्थितियों का ही प्रभाव नहीं पड़ता, आपके किनके साथ रहते हैं, इसकी भी अहम भूमिका है।

यह सच है कि इसमें लोगों की अहम भूमिका होती है। क्योंकि मुख्यतः वे ही आपके सुख-दुख के लिए जिम्मेदार होते हैं।

अगर माता-पिता की बात करें तो बच्चे अंत में घर छोड़ ही देते हैं। अभिभावक यह बात अच्छी तरह जानते भी हैं। इसके बावजूद, बच्चों के जाने का समय आने पर उनके लिए अकेलापन सहना बहुत कठिन हो जाता है। क्योंकि घर अब पहले जैसा नहीं रहता, इसमें सिर्फ़ बच्चों की यादें बची हैं।

एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम यानी खालीपन

एक शब्द है, खालीपन जो एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम (Empty Nest Syndrome) को सबसे अच्छी तरह परिभाषित करता है। इसका अर्थ है, आपका उन बच्चों को खोने का ग़म, जिन्होंने अब अपने पैरों पर खड़े होने, अकेले रहने या घर से बाहर पढ़ाई करने या फ़िर अपनी ज़िंदगी संवारने और शादी करके अलग रहने का निर्णय ले लिया है।

माएं अकेलापन महसूस करती हैं, इसकी संभावना ज़्यादा है। कारण भी साफ़ है। उन्होंने बच्चे को 9 महीने तक अपने पेट में पाला-पोषा है। इसलिए वे उनसे ज़्यादा गहरा लगाव महसूस करती हैं।

ऐसे में मां के लिए उसके बच्चे बहुत अहम होते हैं। एक मां अपने बच्चों की छोटी से छोटी बातों का ध्यान रखती है। उनकी ज़िंदगी में होने वाली किसी भी घटना-दुर्घटना के लिए वह ख़ुद को ही पूरी तरह जिम्मेदार मानती है।

अचानक एक दिन आप देखते हैं, बच्चों का बेडरूम खाली है। आपको अब इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी कि वे कब घर लौटेंगे। अब आपको उनसे खुलकर बातें करने का मौका भी नहीं मिल पाएगा।

घर में सबकुछ पूरी तरह बदल जाता है। एक माता-पिता के तौर पर आप उदास हो जाते हैं। इस हाल में कई बार आप एेसा काम कर बैठते हैं कि बच्चे परेशान हो जाते हैं। जैसे कि आपका उन्हें रोज़ाना कॉल करके हालचाल पूछना।

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अपने बच्चे से संपर्क और बातचीत की कोशिश करना एक माता-पिता के लिए सामान्य बात है। अंतर सिर्फ इतना है, अब बहुत कुछ बदल गया है।

यह स्थिति अकेले पिता या अकेली मां के लिए और भी ज़्यादा कष्टकारी होती है। वहीं, पति-पत्नी के लिए एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम सहना थोड़ा आसान हो जाता है, लेकिन अकेले में अकेलापन बढ़ जाता है।

इसके बावजूद, आपको सच्चाई स्वीकार करनी होगी और हालात का सकारात्मक तरीके से सामना करना सीखना होगा। यह मुश्किल ज़रूर है लेकिन समय की मांग है। आप अब यह मान लें कि बच्चे अब घर छोड़ चुके हैं।

ख़राब है आज की युवा पीढ़ी की मौजूदा स्थिति

आजकल युवाओं को जैसी ज़िंदगी बितानी पड़ रही है, उससे एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम की गंभीरता और बढ़ गई है। बच्चे बड़े होने के बाद भी कभी घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

दरअसल, बेरोजगारी, नौकरी की अनिश्चितता, प्रेरणा की कमी या घर की आरामदेह ज़िंदगी माता-पिता को यह विश्वास दिलाती है कि उनके बच्चे ज़िंदगी भर उनके साथ ही रहेंगे।

कई बार कोई नौकरी मिलती है तो उन्हें घर से दूर जाना पड़ता है। नौकरी विदेश में भी हो सकती है। इससे वे माता-पिता और उदास हो जाते हैं जो इस परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं।

जब बच्चे अपने पैरों पर खड़े होने के लिए घर छोड़ देते हैं और अलग घर बसा लेते हैं तो माता-पिता की तक़लीफ़ और बढ़ जाती है। अब उन्हें पता चलता है, उनके लिए नाती-पोतों से मिलना, उन्हें दुलारना कितना मुश्किल हो गया है।

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ऐसे सहें बच्चों से बिछुड़ने का ग़म

एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम की गंभीरता माता-पिता और बच्चों के रिश्ते पर निर्भर है। जैसा कि हमने ऊपर कहा है, अकेले पिता और अकेली मां के लिए यह जुदाई सहना बहुत दुखदायी है। हालांकि थोड़ा प्रयास करने पर आप इससे उबर भी सकते हैं।

  • सच्चाई स्वीकार करेंः कई बार आप हालात से जूझते रहते हैं पर समस्या हल करना आपके बस में नहीं होता है। ऐसे में समय की मांग है, आप यह स्वीकार करें कि अब आपके बच्चे अपने दम पर अपनी ज़िंदगी जीने जा रहे हैं।
  • अपने पार्टनर पर दें ध्यानः अगर आप दंपति हैं तो कई बार सारा ध्यान बच्चों पर रहता है। अपने पाटर्नर को नज़रअंदाज कर देते हैं। अब समय है कि आप दोनों फिर एक-दूसरे को समय दें, वैवाहिक जीवन का आनंद उठाएं।
  • घर पर अकेले न रहें: चाहे आप अकेले या अकेली हैं या फिर दाम्पत्य में, यह समय मेल-जोल बढ़ाने का है। दोस्तों से मिलें, सैर करने जाएं या फिर ख़ुद को नई रोमांचक गतिविधियों में शामिल करें ताकि जब आप खाली घर में लौटें तो आपको अकेलापन कम महसूस हो।

एंप्टी नेस्ट सिंड्रोम से पार पाना मुश्किल है, लेकिन यह न भूलें कि यह एक ऐसी स्थिति है जिससे हर माता-पिता को गुजरना ही पड़ता है।

स्थिति स्वीकार करना, उसे समझना और उससे निपटने का प्रयास करना ही वह सबसे अच्छा तरीका है, जिससे आप अपने सबसे अच्छे मददगार बन सकते हैं।