इन तीन बौद्ध सिद्धांतों की मदद से अपने भावनाओं का रखें ख़याल

इन बौद्ध सिद्धांतों की बदौलत ध्यान लगाकर और आतंरिक वार्ता करके हम अपने मन में उठते शोर को शांत कर सकते हैं व अपनी नकारात्मक भावनाओं पर लगाम लगा सकते हैं।
इन तीन बौद्ध सिद्धांतों की मदद से अपने भावनाओं का रखें ख़याल

आखिरी अपडेट: 14 मार्च, 2019

सुनने में यह बात भले ही कितनी भी अजीब क्यों न लगे पर बात जब मानव भावनाओं की आती है तो बौद्ध सिद्धांतों और पश्चिमी मनोविज्ञान में कई समानतायें पायी जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, इन दोनों ही दर्शनों में हम पाते हैं कि अपनी भावनाओं को गहराई से समझ लेने से हमारे लिए आत्मज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग खुल जाता है। अपने अंदर सुधार लाकर ज़्यादा ईमानदारी से एक सही पथ पर आगे बढ़ने में वह हमारी मदद करता है।

इन सिद्धांतों की तरफ़ ध्यान देकर हम न सिर्फ़ अपने शारीरिक और मनोवैज्ञनिक स्वास्थ्य में सुधार ले आते हैं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को भी गहराई से समझ पाते हैं।

साथ ही, यहाँ आपको इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि मेडिटेशन जैसी रणनीतियां पहले से ही कई थेरेपी का हिस्सा हैं। तनाव और चिंता नाम के रोज़मर्रा की अपनी ज़िन्दगी के दो सबसे आम दुश्मनों से निपटने का यह एक बेहद कारगर उपाय होता है।

अपनी भावनाओं को खोजकर उनसे सीख लेने के लिए इस लेख के माध्यम से बौद्ध धर्म के तीन सिद्धांतों के बारे में मनन करें।

1. दुःख का मोह या ख़ुशी की आज़ादी: फैसला आपका है

बौद्ध धर्म के अनुसार आपकी ख़ुशी सिर्फ़ और सिर्फ़ आप पर निर्भर करती है

मुक्ति और ज्ञान के मार्ग में अपनी भावनाओं को जानने-समझने के लिए आमतौर पर हमारा मनोविज्ञान ही हमें प्रेरित करता है

हमारे अतीत और वर्तमान को हमारे ज़ेहन में ज़िन्दा रखकर वह हमें उनका मतलब समझने और थेरेपी की मदद से उनका सामना करने के लिए प्रेरित करता है।

लेकिन बौद्ध सिद्धांतों का इस विषय में एक अलग दृष्टिकोण है। उनके मुताबिक़, आतंरिक वार्ता और ध्यान के माध्यम से धीरे-धीरे हमें अपनी नकारात्मक भावनाओं को “कम” और “शांत” कर देना चाहिए

इसके अलावा, बौद्ध सिद्धांतों की मदद से यह बात हमारी समझ में आ जाती है कि अपनी भावनाओं को समझने में कभी-कभी हमसे भूल हो जाती है।

उदाहरण के तौर पर, हममें से कई लोगों का मानना है कि ख़ुशी का अस्तित्व हमारे बाहर, किसी और इंसान, जगह या चीज़ में होता है। लेकिन इस तरह का भौतिकवाद या अपने काबू से बाहर के प्राणियों या चीज़ों का मोह दरअसल हमारे दुःख का सबब बनता है

वास्तविक ख़ुशी का वजूद कहीं बाहर नहीं, आपके आतंरिक संतुलन में ही है। शान्ति, संतुलन और आत्मस्वीकृति के माध्यम से आप उसे अपने ही मन के भीतर खोज निकाल सकते हैं।

अनासक्ति का दैनिक अभ्यास अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने की एक सही रणनीति होती है।

हमारे पास किस चीज़ की कमी है, हमारे पास क्या नहीं या हमारे पास क्या होना चाहिए – इन चीज़ों के बारे में शिकायत करते रहने की अपनी सनक का स्विच “बंद” कर देने पर हम देख पाते हैं कि दरअसल हमारे पास क्या-क्या है। खुद से व अपने पास मौजूद चीज़ों सी खुश रहने की यह काबिलियत हम सभी में होती है।

2. बौद्ध सिद्धांतों के अनुसार धैर्य और प्यार का पोषण

बौद्ध सिद्धांतों में प्यार और धीरज को बहुत तवज्जो दी गई है

हम तात्कालिकता के युग में जी रहे हैं। यहाँ हर क्रिया की प्रतिक्रिया फ़ौरन देखी जा सकती है।

उदाहरण के तौर पर, नयी तकनीकें हमारे मन में इस मान्यता को जगाती हैं कि हर चीज़ फ़ौरन होनी चाहिए। हमें लगता है कि हमें जल्द से जल्द अपने मेसेजिस का रिप्लाई करना चाहिए। इसके अलावा, कोई फोटो या कमेंट डालकर कुछ ही सेकंड में “लाइक्स” के रूप में हम वाहवाही बटोरने लगते हैं।

पर ज़िन्दगी ऐसी नहीं होती। जीवन की अपनी एक गति होती है। मज़बूत रिश्तों की बुनियाद रखी जाती है दिन-प्रतिदिन के मंथर जादू, धैर्य, सम्मान और एक स्थिर और समझदार लगाव पर।

अपने धैर्य के पौधे में थोड़ा-सा पानी डाल देने से ही हमारे गुस्से, जलन, क्रोध और निराशा जैसी भावनाओं की आग ठंडी पड़ जाती है।

चिंता और तनाव जैसी भावनाओं का जन्म ही इस तात्कालिकता से होता है। आने वाले कल के डर और दूर खड़े भविष्य की ओर बढ़ने की जल्दबाजी ही इन भावनाओं को पोषित करती हैं।

धैर्य के माध्यम से अपने वर्तमान को गले लगाना सीखें।

3. अपने अहंकार को डीएक्टिवेट करने का महत्त्व

बौद्ध सिद्धांतों में अहम के मोह को त्यागने का परामर्श दिया गया है

हम सभी किसी न किसी ऐसे इंसान को जानते ही हैं, जिसकी नाक पर हमेशा गुस्सा सवार रहता है।

ऐसे लोगों को हर चीज़ से कोई न कोई परेशानी होती है। उनकी अपेक्षाओं और नैतिक, भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक मानकों पर कोई भी बात खरी नहीं उतरती।

उनकी अपेक्षाओं की इमारत इतनी ऊंची और उनका अहंकार इतना विशाल होता है कि पूरी दुनिया उन्हें छोटी लगने लगती है। इससे भी ख़राब बात तो यह है कि दुनिया को वे अपने दुश्मन के तौर पर देखने लगते हैं।

जीवन के प्रति इस दृष्टिकोण की वजह से ढेर सारे दुःख के साथ-साथ उनके मन में यह बात भी घर कर जाती है कि इस दुनिया में वे बिल्कुल अकेले हैं

अपने अहंकार को डीएक्टिवेट करना कोई बच्चों का खेल नहीं होता। इसके पीछे एक बहुत ही पुख्ता कारण होता है: दूसरों का अहंकार तो हमें बहुत आसानी से दिखाई दे जाता है, मगर अपने अहंकार को देखने लायक कोई डिटेक्टर हमारे पास नहीं होता

इन आसान-सी रणनीतियों का सहारा लेकर आप अपने अहंकार को पहचान सकते हैं व उसे नियंत्रित और शांत कर सकते हैं:

  • सबसे पहले तो यह समझ लें कि आपकी बातों और कर्मों से दूसरों पर क्या असर पड़ता है।
  • उसके बाद अपनी खामियों, गलतियों और कमज़ोरियों का पता लगाएं
  • इस बात को समझने की कोशिश करें कि हमारी अपेक्षाओं पर खरे उतरने, हमारी इच्छाओं या ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हम किसी को बाध्य नहीं कर सकते
  • किसी से कोई भी अपेक्षा न रखें। किसी और से कोई अपेक्षा करने के बजाये खुद से अपेक्षा करना सीखें। ऐसा करके आप अपनी ज़िन्दगी को ज़्यादा शांत और संतुलित बना पाएंगे।
  • अपनी कमियों को पहचानने के साथ-साथ अपने आसपास मौजूद लोगों की अच्छी बातों पर गौर करना भी सीखें

अंत में, अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखने के लिए बौद्ध धर्म के ये सिद्धांत-स्तंभ हमें एक बढ़िया मार्ग दिखाते हैं।

उन सिद्धांतों के सबसे बड़े उद्देश्यों में से एक है आत्मबोध के माध्यम से अर्जित अपने ज्ञान में सुधार लाना, ताकि हम यह समझ सकें कि हमारी ख़ुशी सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे अपने हाथों में ही होती है

आज ही से अपने ऊपर मेहनत करना शुरू कर दें!

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