गर्भावस्था की जटिल स्थिति प्री-एक्लेमप्सिया के बारे में सबकुछ जानें

अगस्त 6, 2019
प्रीएक्लेप्सिया गर्भावस्था की एक प्रमुख जटिलता है जो माँ और उसके अजन्मे बच्चे के जीवन के लिए ख़तरा बन सकती है। इसलिए एक हेल्दी लाइफस्टाइल जीना, विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान और प्रसव पूर्व रेगुलर जांच कराते रहना इसे रोकने का सबसे अच्छा तरीका है।

प्री-एक्लेमप्सिया गर्भावस्था की जटिलता है जो दूसरी बातों के अलावा हाई ब्लडप्रेशर या किडनी डैमेज के कारण हो सकती है। यह गर्भवती महिलाओं की 5-8% आबादी को प्रभावित करता है और माँ और बच्चे दोनों के लिए जानलेवा हो सकता है।

प्री-एक्लेमप्सिया (Preeclampsia) आमतौर पर आख़िरी ट्राईमेस्टर (तिमाही) में प्रकट होता है। हालांकि यह बच्चे के जन्म के दौरान, गर्भावस्था की दूसरी छमाही में या प्रसव के बाद पहले हफ़्ते में भी उभर सकता है।

यह स्थिति हल्की या गंभीर हो सकती है। अगर इसका ठीक से या सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो यह ज्यादा गंभीर स्थितियों को जन्म दे सकता है, जैसे कि एक्लम्पसिया या एचईएलएलपी सिंड्रोम (HELLP Syndrome)।

प्री-एक्लेमप्सिया क्यों उभरता है?

प्री-एक्लेमप्सिया क्यों उभरता है?

प्लेसेंटा में खून की सप्लाई कम होने के कारण प्री-एक्लेमप्सिया प्रकट होता है। फिर प्लेसेंटा अपने आपको युटेराइन वाल या गर्भाशय की दीवार में ठीक से प्लान्ट नहीं करता है और उस क्षेत्र की आर्टरीज उतनी नहीं फैल पातीं जितना उन्हें होना चाहिए।

क्रोनिक हाइपरटेंशन और डायबिटीज से भी प्लेसेंटा में खून का प्रवाह कम हो सकता है। कुछ प्रोफेशनल्स का मानना ​​है कि प्री-एक्लेमप्सिया गर्भावस्था की शुरुआत में ही प्रकट होता है, भले ही लक्षण बाद में विकसित होते हैं।

प्री-एक्लेमप्सिया के लक्षण

कुछ महिलाएं जिनमें प्री-एक्लेमप्सिया की डायग्नोसिस की गयी है, उनमें इसके विशिष्ट लक्षण विकसित नहीं होते हैं। इसी तरह सभी महिलाओं में एक ही तरह के लक्षण भी नहीं विकसित होते हैं।

समस्या यह है कि प्री-एक्लेमप्सिया के कुछ लक्षण, जैसे कि मतली (nausea) या सूजन (swelling) को गर्भावस्था के आम लक्षणों के रूप में भी देखा जा सकता है

इस वजह से डॉक्टरों को पता होना चाहिए कि इस कॉम्प्लीकेशन के चेतावनी संकेतों को समय रहते प्रभावी तरीके से कैसे पहचाना जाए।

वे संकेत हैं:

हल्के प्री-एक्लेमप्सिया के मामले में (In the Case of Mild Preeclampsia)

  • हाइपरटेंशन
  • देह में जल जमाव (Water retention)
  • मूत्र में प्रोटीन

गंभीर प्री-एक्लेमप्सिया के मामले में (In the Case of Severe Preeclampsia)

  • सिरदर्द और धुंधली दृष्टि (Headaches and blurred vision)
  • तेज रोशनी को सहन करने में असमर्थता
  • थकान, मतली और उल्टी (Fatigue, nausea, vomiting)
  • मूत्र की मात्रा में कमी
  • ऊपरी पेट में दर्द (Upper abdominal pain), आमतौर पर दाईं ओर
  • आसानी से जख्म लगना (Bruising)

यह याद रखना अहम है कि प्री-एक्लेमप्सिया वाली सभी महिलाएं दिखने वाली सूजन या वजन में बढ़ोतरी का शिकार नहीं होती हैं। साथ ही, इन लक्षणों से पीड़ित सभी महिलाओं में ज़रूरी नहीं कि प्री-एक्लेमप्सिया की स्थिति पैदा हुई है। ऊपर बताये गए लक्षण भ्रामक भी हो सकते हैं।

प्री-एक्लेमप्सिया के रिस्क फैक्टर

प्री-एक्लेमप्सिया के रिस्क फैक्टर

मोटापा, डायबिटीज और हाइपरटेंशन प्री-एक्लेमप्सिया से जुड़े प्रमुख रिस्क फैक्टर हैं।

कई दूसरे फैक्टर भी इस स्थिति के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। यदि यह गर्भवती महिला की पहली प्रेग्नेंसी है, वह पहले उच्च रक्तचाप या किडनी की बीमारी से पीड़ित रही है या प्री-एक्लेमप्सिया की उसकी फैमिली हिस्ट्री है, तो इसका शिकार होने का जोखिम उसे ज्यादा रहता है।

इसी तरह एकाधिक बार गर्भधारण करने वाली महिलाएं, जिन महिलाओं में पहले से जेस्टेशनल हाइपरटेंशन या प्रीक्लेम्पसिया थी या जिन महिलाओं का BMI 30 या उससे ज्यादा है, उन्हें भी इसका जोखिम ज्यादा है। 20 साल की उम्र से कम या 40 पार की गर्भवती महिलाएं प्री-एक्लेमप्सिया को ज्यादा आसानी से विकसित कर सकती हैं।

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रोकथाम

नियमित प्रसव पूर्व जांच से आपका डॉक्टर निगरानी करेगा और इनका निर्देश दे सकता है :

  • ब्लड प्रेशर
  • यूरिन लेवल
  • ब्लड टेस्ट

इसके अतिरिक्त इस समस्या को उभरने से रोकने के दूसरे तरीके भी हैं, जैसे:

  • रक्त के थक्के और किडनी के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए टेस्ट
  • सोनोग्राम
  • डॉपलर अल्ट्रासाउंड

इन टेस्ट के बावजूद इस स्थिति को रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। क्योंकि इसके उभरने में योगदान करने वाले सभी कारणों को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

इसलिए हेल्थ प्रोफेशनल अक्सर एक बैलेंस डाइट खाने और एक्सरसाइज करने की सलाह देते हैं। साथ ही रेगुलर मेडिकल टेस्ट भी करवाते हैं।

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इलाज

नियमित प्रसवपूर्व चेकअप से इस गंभीर जटिलता और कई दूसरी समस्याओं की शुरुआत में ही पहचान लेने की सुविधा मिल सकती है

इस रोग का इलाज प्रेगनेंसी के स्टेज पर निर्भर करता है। अगर यह स्थिति डिलीवरी डेट के आसपास पैदा होती है और बच्चा विकसित हो गया है, तो ज्यादा संभव है कि डॉक्टर जनन प्रक्रिया शुरू कर देंगे।

यदि प्री-एक्लेमप्सिया हल्के रूप में है, और बच्चे का विकास नहीं हुआ है, तो इलाज प्रीनेटल चेकअप बढ़ाने पर आधारित होगा। इसी तरह आपका डॉक्टर आपको खाने में ज्यादा प्रोटीन शामिल करने के लिए कहेगा।

नमक का कम सेवन और भरपूर पानी पीना भी अहम है। उतना ही ज़रूरी भरपूर आराम करना है। बच्चे के वजन को प्रमुख ब्लड वेसल्स से दूर रखने के लिए डॉक्टर मरीज को बाईं करवट सोने के लिए कहेंगे।

अगर महिला गंभीर प्री-एक्लेमप्सिया से पीड़ित है, तो डॉक्टर ऊपर बताये गए इलाज के साथ-साथ ब्लडप्रेशर कंट्रोल करने के लिए दवायें लिख सकते हैं।

प्रीएक्लेप्सिया गर्भावस्था की एक प्रमुख जटिलता है जो माँ और उसके अजन्मे बच्चे के जीवन के लिए ख़तरा बन सकती है। इसलिए एक हेल्दी लाइफस्टाइल जीना, विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान और प्रसव पूर्व रेगुलर जांच कराते रहना इसे रोकने का सबसे अच्छा तरीका है।

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