काइनेशियो टैपिंग और इसकी उपयोगिता

जुलाई 8, 2019
 जापान में काइनेशियो टैपिंग का अच्छा स्वागत हुआ है। हालांकि अभी भी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। फिर भी इस प्रक्रिया में कई फायदों को ढूँढा जा रहा है।

आपने शायद पहले कभी काइनेशियो टैपिंग शब्द नहीं सुना होगा। हालाँकि आपने कभी-कभी सड़क पर किसी को अपने शरीर के एक या ज्यादा हिस्सों में कुछ रंगीन पट्टियाँ लगाए देखा होगा।

ये स्ट्रिप्स क्या हैं? ये किस काम में इस्तेमाल होते है? ये कैसे काम करते है? क्या कोई इनका उपयोग कर सकता है?

इन एड्हेसिव और हाइपोएलर्जेनिक कॉटन स्ट्रिप्स का इस्तेमाल  चोटों और दूसरी शारीरिक गड़बड़ियों के इलाज में किया जाता है। काइनेशियो टैपिंग का आविष्कार 1970 में किया गया था और जापान जैसे देशों में इसका अच्छा स्वागत हुआ।

आइए देखें, यह तकनीक सिर्फ पेशेवर एथलीटों के मामले में बल्कि विभिन्न इलाजों में क्यों उपयोगी साबित हुई है।

काइनेशियो टैपिंग क्या है?

काइनेशियो टैपिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें शरीर के जख्मी अंगों पर कॉटन, हाइपोएलर्जेनिक वाटर रेजिस्टेंट इलास्टिक स्ट्रिप रखे जाते हैं। मूवमेंट की सहूलियत के लिए ये स्ट्रिप्स ऐसे फाइबर से बने होते हैं जो अपनी असली लंबाई के मुकाबले 140% तक खिंच सकते हैं।

एक बार एक्सपर्ट द्वारा उनके सही जगह पर रख देने के बाद वे कई दिनों तक त्वचा पर रह सकते हैं। हालांकि उन्हें समय-समय पर बदला जाना चाहिए (आमतौर पर 3-4 दिनों के बाद)।

जाहिर है ये स्ट्रिप लचीलेपन या मूवमेंट में कोई रुकावट नहीं डालते हैं। इसके उलट ये जख्म के भरने में तेजी लाते हैं। इसलिए वे कई किस्म के इलाज के लिए एक अच्छे पूरक हैं।

टैपिंग का रंग

काइनेशियो टैपिंग का उपयोग मांसपेशियों के स्ट्रेस के इलाज में किया जाता है

काइनेशियो टैपिंग का रंग प्लेसमेंट साइट, ट्रैक्शन की किस्म और चोट व दूसरे फैक्टर के अनुरूप अलग-अलग होगा। उदाहरण के लिए वे मांसपेशियों को आराम  देने के लिए नीली और काली पट्टियों का उपयोग करते हैं (एक एनाल्जेसिक असर भी होता है), जबकि गुलाबी और पीले रंग की स्ट्रिप उत्तेजक होती हैं।

ये  कैसे काम करते हैं?

एक बार जब टैपिंग लग जाने पर मूवमेंट से पैदा होने वाली गर्मी एक तरह की मालिश का काम करती है जो समस्या को कम करती है

टेप के फायदे

हालांकि क्लिनिकल ट्रायल में अभी तक इसका असर नहीं पाया गया है।  लेकिन कुछ पेशेवर बताते हैं कि यह एक ऐसे तकनीक है जिसके निम्नलिखित फायदे हैं।

  • यह लिम्लफैटिक ड्रेनेज को बढ़ावा देता है।
  • ब्लड सर्कुलेशन को सक्रिय करता है।
  • पॉस्चर बेहतर बनाने में मदद करता है (कमजोर मांसपेशियों का अलाइनमेंट ठीक करता है)।
  • जोड़ों और मांसपेशियों को अतिरिक्त सहायता देता है।
  • मांसपेशियों की थकान कम करता है।
  • सूजन को कम करता है और दर्द से राहत देता है।
  • आईबुप्रोफेन जैसे एंटी इन्फ्लेमेटरी दवाओं के सेवन को कम करने में उपयोगी हैं।

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काइनेशियो टैपिंग के लिए अच्छा क्या है?

वे निम्न स्थितियों के लिए इस प्रकार के उपचार का उपयोग करते हैं:

  • अवकुंचन (Contractures)
  • पीठ दर्द
  • स्थानीय दर्द
  • स्पोर्ट्स इंजरी
  • मांसपेशियों की थकान
  • कार्पल टनल सिंड्रोम (Carpal tunnel syndrome)
  • मांसपेशियों में ऐंठन
  • ब्लड सर्कुलेशन और ड्रेनेज की समस्याएं (सेल्युलाईट, फ्लेसीडिटी, एडमास, आदि)।

यह कैसे काम करता है?

हर मामले में काइनेशियो टैपिंग को फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा ही सही जगह पर रखा जाना चाहिए।

एक स्पेशलिस्ट कम या अधिक लचीलेपन वाले टेप (जो को हर केस पर निर्भर करता है) को चोट वाले अंग पर लगाता है। वे इसे खींच कर लगाते हैं ताकि इसका सही “असर” हो। टेप फाइबर की फ्लेक्सिबिलिटी और वेव फॉर्म के कारण काइनेशियो टैपिंग त्वचा की सूक्ष्म ऊंचाई को बढ़ावा देता है। इस प्रकार यह चोट पर दबाव कम करता है और ऐसी उत्तेजना को रोकता है जो दर्दनाक हो सकती है।

ज़रूरी बातें

  • त्वचा साफ-सुथरी, सूखी, बाल रहित और बिना किसी क्रीम या तेल की होनी चाहिए (क्योंकि ये टेप को सही तरीके से पालन करने की अनुमति नहीं दे सकते हैं)।
    बेहतर ग्रिप के लिए टेप के छोर हमेशा गोल रहने चाहिए।
  • टेप लगाने के बाद इसे धीरे से रगड़ना चाहिए।
  • इसे लगा कर आप नहा सकते हैं। हालांकि टेप किए गए अंग को छूने या धोने से बचें।
  • जलन हो तो टेप को तुरंत हटाने के लिए प्एरोफेशनल के पास जाना चाहिए। ध्यान रखें कि कभी-कभी कुछ झुनझुनी या खुजली का अनुभव होना आम है। यह ब्लड सर्कुलेशन बढ़ने के कारण होता है।

याद रखने वाली बातें

बेहतर हो कि आपका सही आकलन करने के बादक फिजियोथेरेपिस्ट टेप लगाए। ऐसा लग सकता है कि काइनेशियो टैपिंग लगाना आसान है। हालांकि, आपको इसे घर पर खुद लगाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।

  • Espejo L, Apolo MD. Revisión bibliográfica de la efectividad del kinesiotaping. Rehabilitación. 2011; 45 (2): 148-158. doi:10.1016/j.rh.2011.02.002