बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम: छोटे-मोटे दुर्व्यवहार पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थता

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम एक ऐसे मेंढक की कहानी है, जिसने अपनी सारी की सारी ऊर्जा परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में खर्च कर दी व मुश्किल की घड़ी आने पर उसके पास अपनी हिफाजत करने का कोई ज़रिया ही नहीं बचा था।
बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम: छोटे-मोटे दुर्व्यवहार पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थता

आखिरी अपडेट: 12 अक्टूबर, 2018

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम का मतलब उस भावनात्मक थकान से है, जिसकी अनुभूति हमें किसी ऐसी स्थिति में होती है, जिससे बचकर निकलना नामुमकिन होता है। नतीजतन आप उसके खिलाफ़ तब तक जूझते चले जाते हैं जब तक वे परिस्थितियां पूरी तरह से आपको खपा नहीं देती।

आप कह सकते हैं कि यह खुद को किसी ऐसे दुष्चक्र में फंसाए रखने जैसा होता है, जो मानसिक और भावनात्मक रूप से हमें पूरी तरह से थका डालता है।

‘बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम’ के बारे में आसान शब्दों में एक इलस्ट्रेट की हुई स्टोरी लिखने का श्रेय फ्रेंच लेखक और दार्शनिक ओलिविएर क्लेर्क को जाता है। आइए इस कहानी पर एक नज़र डालते हैं और फ़िर उससे मिली सीख को अपने जीवन में लागू करने की तकनीक के बारे में जानते हैं।

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम: मेंढक जिसने अपनी एनर्जी व्यर्थ बर्बाद कर दी

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम और उसके पीछे की कहानी

यह काल्पनिक कथा भौतिक-विज्ञान के इस वास्तविक नियम पर आधारित है कि “पानी के गर्म होने के तापमान का 0.02 डिग्री सेल्सियस प्रति मिनट से कम रेट पर बढ़े तो उसमें बैठा कोई मेंढक वहीं टिका रहेगा व पानी के ज़्यादा गर्म हो जाने पर अपना दम तोड़ देगा। तापमान इससे ऊपर की रेट से बढ़ने पर मेंढक पानी से बाहर छलांग लगाकर अपनी जान बचा लेगा।”

दूसरे शब्दों में, ओलिविएर क्लेर्क के अनुसार, किसी मेंढक को कम आंच पर उबलते पानी के पतीले में डाल देने पर धीरे-धीरे वह अपने शरीर के तापमान को उसके अनुकूल बना लेता है

जब पानी उबलने लगता है तो मेंढक अपने तापमान को नियंत्रित नहीं कर पाता व कूदकर बाहर निकलने की कोशिश करने लगता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश, अपने तापमान को अनुकूलित करने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च चुके मेंढक के लिए तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उस मुश्किल से निकल भागने के लिए उसमें कोई शक्ति ही नहीं बचती।

फलस्वरूप बाहर कूदकर खुद को बचा पाने में अक्षम मेंढक पानी में उबल-उबलकर ही मर जाता है

यहाँ यह सवाल उठना लाज़मी है: मेंढक की जान किसने ली? उबलते पानी ने या फ़िर वक़्त रहते खुद को बचा लेने का फैसला न कर पाने की उसकी असमर्थतता ने?

अगर आपने उसे 50 डिग्री सेल्सियस वाले पानी के पतीले में रखा होता तो वह झट से बाहर कूदकर अपनी जान बचा लेता। लेकिन धीरे-धीरे बढ़ते तापमान को महसूस करते समय उसे यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह बाहर निकल भी सकता है और उसे बाहर निकलना भी चाहिए

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम से कैसे बचें

खामोश पतन जिससे हमें धोखा होता है कि सबकुछ ठीक है

एक धीमे भावनात्मक पतन के बारे में किसी को पता ही नहीं चलता। इसलिए हम न ही कोई प्रतिक्रिया देते हैं और न ही उससे जूझने की कोशिश करते हैं। अंत में, अपना दम घोंटने वाली ज़हरीले हवा के आगोश में समाकर हम बुरी तरह से फंस जाते हैं।

धीरे-धीरे होने वाला कोई बदलाव हमारी नज़रों से बचा रहता है। इसलिए हम किसी तरह की कोई भी प्रतिक्रिया या फ़िर प्रतिरोध कर पाने में असफल रहते हैं।

ऐसे में, आमतौर पर किसी न किसी प्रेम संबंध, नौकरी, पारिवारिक परिस्थितियों, यार-दोस्तों और यहाँ तक कि सामाजिक परिस्थितियों में भी बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम के कई शिकार देखने में आ ही जाते हैं।

जब निर्भरता, घमंड, स्वार्थ, या फ़िर अनुचित मांगें धीरे-धीरे पनपने लगती हैं तो यह समझ पाना काफ़ी कठिन हो जाता है कि वे हमें किस जंजाल में धकेल रही हैं।

बल्कि हो सकता है, उस समय आपको यह देखकर अच्छा भी लगे कि आपके साथी को आपकी ज़रूरत है, आपका बॉस आप पर भरोसा कर आपको कुछ काम सौंप रहा है या फ़िर आपका कोई भरोसेमंद दोस्त लगातार आपके साथ वक़्त बिताना चाहता है।

लेकिन वक़्त के साथ-साथ ये चीज़ें आपकी प्रतिक्रिया के समय को कम करती जाती हैं। वह कोई स्वस्थ रिश्ता नहीं है, इस बात को समझ पाने की आपकी सारी की सारी ऊर्जा व क्षमता ख़त्म हो जाती है।

बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम व उसके नुकसान

असहजता का आदी हो जाने की यह मूक प्रक्रिया आपका काम ख़राब कर देगीऔर धीरे-धीरे, बहुत चालाकी से आपकी ज़िन्दगी को अपने काबू में ले लेती है। अपनी आवश्यकतानुसार खुद को सही तरीके से तैयार करने से वह आपको रोकती है।

इसलिए अपनी आँखों को खुला रखने की एक सचेत कोशिश करके अपनी पसंद-नापसंद को समझ लेना आपके लिए बेहद ज़रूरी होता है। सही-गलत की आपकी समझ पर पड़े परदे को उतार फेंकने का एक यही रास्ता होता है।

आगे बढ़ने के लिए अगर आपको थोड़ी असहजता का सामना भी करना पड़े तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है।

कई बार आपके आसपास रह रहे लोग इस बात को हज़म नहीं कर पाते कि आपने अपने हक़ के लिए लड़ने का फैसला किया है। आपको अपने इशारों पर नचाने की उन्हें एक आदत-सी हो चुकी होती है और आपके रवैये में आया वह बदलाव उनके लिए काफ़ी तकलीफ़देह होता है।

इस बात का ध्यान रखें कि कभी-कभी “बस, अब बहुत हुआ!” कह देने में ही आपकी और आपके आत्मसम्मान की भलाई होती है।

तो बॉयल्ड फ्रॉग सिंड्रोम को हमेशा ध्यान में रखकर, कष्ट पहुंचाने वाली चीज़ों की सही समय पर पहचान कर दर्द के गहरे कूएं में गिरने से खुद को बचा लें।



  • Clerc, O. (2007). La rana que no sabía que estaba hervida… y otras lecciones de vida. Madrid: Maeva
  • Savater, F. (1995). Ética Como Amor Propio. Libro de Mano.
  • Smith, A., & Rodríguez Braun, C. (2004). La teoría de los sentimientos morales. El libro de bolsillo.

यह पाठ केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए प्रदान किया जाता है और किसी पेशेवर के साथ परामर्श की जगह नहीं लेता है। संदेह होने पर, अपने विशेषज्ञ से परामर्श करें।