दूसरों को मैनीप्यूलेट करने के एब्यूजर्स के 7 हथकंडे

19 दिसम्बर, 2018
सोची-समझी मैनीप्यूलेट करने वाली रणनीतियों की मदद से धूर्त लोग दूसरों को प्रभावित कर अपने उस जाल में फंसा लेते हैं, जिससे बचकर बाहर निकल आना बहुत मुश्किल होता। इस बात का एहसास आपको जितनी जल्दी हो जाए, आपके लिए उतना ही बेहतर होता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे साथ दुर्व्यवहार करने वाले लोगों के पास हम क्यों लौट जाते हैं? उनके हाथों प्रताड़ित होने के बाद भी हम वापस क्यों चले जाते हैं? आपके इन सवालों के जवाब ऐसे लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली मैनीप्यूलेट करने वाली रणनीतियों में छिपे होते हैं।

वे रणनीतियां बेहद जटिल होती हैं। जल्दबाज़ी के किसी पल में घबराहट और निराशा के बोझ तले वे हमें दबा देते हैं। ऐसे में हम और भी कमज़ोर हो जाते हैं व हमें मैनीप्यूलेट करना उनके लिए और भी आसान हो जाता है।

इस लेख में उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कुछ रणनीतियों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं। हो सकता है कि आपके खिलाफ़ उनका इस्तेमाल किया जा रहा हो। कभी-कभी तो अनजाने में ही हम उन्हें खुद पर भी इस्तेमाल करने लगते हैं

ऐसा इसलिए होता है कि अंदर ही अंदर हमें किसी मनचाहे नतीजे की तलाश होती है।

1. अगर तुम मेरी बात नहीं मानोगी तो मुझे गुस्सा आ जाएगा

मैनीप्यूलेट करने वाले लोगों की रणनीतियां

अपने बचाव में देने के लिए जब उनके पास कोई तर्क नहीं होता तो वे गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं। ऐसा वे ख़ासकर तब करते हैं, जब वे किसी बात से नाख़ुश या डरे हुए होते हैं।

उनके द्वारा ऐसा किए जाने पर स्थिति पूरी तरह से बदल जाती है। वे आपको यह जताने की कोशिश करते हैं कि उस स्थिति के लिए आप ज़िम्मेदार हैं। ऐसा वे इसलिए करते हैं ताकि उनसे माफ़ी मांगकर आप अपने किए को बदलने के दबाव में आ सकें।

और यह सब आप इस बात से अनजान रहकर करते हैं कि उनके आगे झुककर आप उनके रहमोकरम पर जीने की आदत डाल रहे होते हैं।

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2. नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो; ये बात तो मैंने कभी कही ही नहीं

किसी को मैनीप्यूलेट करने की यह सबसे निर्दय और पेचीदा तरकीबों में से एक होती है। एब्यूजर्स ऐसी बातों का सहारा लेते हैं: “ये बात तो मैंने कभी कही ही नहीं” या फ़िर “तुम्हें याद नहीं कि तुम क्या कह रही थी?” अपनी इन तरकीबों से पीड़िता को अपनी ही बात की प्रमाणिकता पर संदेह करने के लिए वे मजबूर कर देते हैं।

एब्यूज़र तो चाहता ही यही है कि पीड़िता आत्म-संदेह से भर जाए। अंत में खुद अपने ही हाथों से वह अपनी ही इच्छाओं और आकांक्षाओं का गला घोंट देती है।

यह एक बार की बात नहीं होती। नतीजतन अपने यार-दोस्तों से अपनी बातचीत के दौरान पीड़ितायें स्थिति के अपने दृष्टिकोण के बारे में उन्हें बताती हैं। ऐसा करके वे इस बात का अंदाज़ा लगा सकती हैं कि उनकी बात में कोई दम है भी या नहीं।

3. मैंने ऐसा इसलिए किया कि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ?

मैनीप्यूलेट करने वाले एब्यूजर्स से बचें

उनकी इस सफ़ाई से सावधान रहें, ख़ासकर अगर वे इसका इस्तेमाल अपने लात-घूंसों और गाली-गलोच के बचाव में करते हैं।

आप पर हाथ उठाने वाला कोई इंसान, आपको मैनीप्यूलेट या अपने काबू में रखने की कोशिश करने वाला कोई इंसान, आपके कहीं आने-जाने पर रोकटोक लगा देने वाला कोई इंसान, लगातार जलन से ग्रस्त या आपको जलील करनी की कोशिश में लगा कोई इंसान… आपसे प्यार तो हरगिज़ नहीं करता।

किसी को बिना शर्त प्यार करने और किसी सनकी की तरह उसे काबू करने की कोशिश करने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। जब हम किसी से सच्चे दिल से प्यार करते हैं तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह इंसान हमारे साथ है या नहीं।

फर्क पड़ता है तो इस बात से कि वह खुश है कि नहीं।

4. अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हें पता है न कि क्या होगा

इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए एब्यूजर्स कुछ ख़ास बातों का सहारा लेते हैं, जैसे “अगर तुम अभी ऐसा नहीं करोगे तो अगली बार वैसा हो जाएगा” या फ़िर “अगर तुमने मुझे डेट न किया तो मैं ख़ुदकुशी कर लूँगा।

ऐसे बातें करके एब्यूज़र चाहते है कि पीड़िता खुद को दोषी ठहराए। सच तो यह है कि 10 में से 9 बार उनकी बातें गीदड़ भभकियां ही होती हैं।

ऊपर दिए मामले में एब्यूज़र, पीड़िता को डरा-धमका कर अपने साथ घूमने-फिरने के लिए उसे मनाने की कोशिश कर रहा है। न चाहते हुए भी वह एब्यूज़र के इशारों पर नाच रही होती है।

5. मैं कसम खाता हूँ कि ऐसा दुबारा नहीं होगा

मैनीप्यूलेट करने के लिए एब्यूजर्स के हथकंडे

आप पर हाथ उठाने या आपके साथ गाली-गलोच करने के बाद आपका साथी अगर अक्सर यह वादा करता है कि वह बदल जाएगा, तो हमारा विश्वास करें कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा।

जब आपका पार्टनर आपके साथ मारपीट कर आपको नियंत्रित व मैनीप्यूलेट करने की कोशिश करता है तो आपको सचेत हो जाना चाहिए। आपके रिश्ते में भरोसा, प्यार और सम्मान तो उसी पल से ख़त्म हो जाते हैं

लोगों में बदलाव आ जाने की आस लगाना कोई बुरी बात नहीं होती। लेकिन ऐसी स्थिति में वह आस किसी बिना सिर-पैर की कल्पना से ज़्यादा और कुछ नहीं होती। आपका साथी अगर एक बार पहले ही आप पर हाथ उठा चुका है तो उसे दुबारा वैसा करने से कोई नहीं रोक सकता।

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6. अपना जवाब तुम्हें अभी देना होगा

कोई एब्यूज़र कभी नहीं चाहेगा कि थोड़ा वक़्त लेकर आप सोच-समझकर कोई फैसला करें। इस हथकंडे को अपनाकर वह अपनी जीत सुनिश्चित कर लेता है।

इसीलिए आपको खुद को थोड़ा स्पेस देना चाहिए। स्थिति का ठीक से मुआइना करने के लिए अपने स्पेस के लिए लड़ना सीखें।

एब्यूजर्स इस बात पर ज़ोर देते हैं कि आप अपना फैसला मौके पर ही सुना दें। लेकिन दरअसल यह मैनीप्यूलेट करने वाली उनकी कई रणनीतियों में से एक होती है।

7. तुम्हारे दोस्त तुम्हारे लायक नहीं हैं

मैनीप्यूलेट होने से बचें

एब्यूजर्स को मालूम होता है कि अपनी कठपुतली को उन्हें उसके दोस्तों और परिजनों से दूर रखना चाहिए। वे सभी लोग पीड़िता को उसकी स्थिति से वाकिफ़ जो करा सकते हैं।

इसीलिए आपके सबसे करीबी लोगों से आपको दूर रखने की वे पूरी कोशिश करते हैं। उनके बारे में आपकी राय बदलने के लिए हो सकता है कि वे मनगढ़ंत कहानियां बनाने लगें।

जल्द ही आपको यह लगने लगता है कि आपको अपने दोस्तों की कोई ज़रूरत ही नहीं है। आपको यह भी लग सकता है कि आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने पार्टनर पर ही ध्यान देना चाहिए। ऐसा तब होता है, जब आपको यह लगने लगता है कि आपकी ज़िन्दगी में बाकी लोगों की कोई ज़्यादा अहमियत ही नहीं है।

सावधान हो जाएँ… ऐसे में आप किसी सधे हुए मैनीप्यूलेटर के कब्ज़े में होते हैं।

इस आखिरी पॉइंट की सबसे ख़ास बात तो यह होती है कि जब तक आपको कुछ समझ आता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। ऐसा इसलिए होता है कि एकदम से हमला कर देने के बजाय कोई एब्यूज़र अपना काम धीरे-धीरे करता है।

धीरे-धीरे वह गुस्सा होने का नाटक करने लगता है, आपसे “आई लव यू” कहकर आपके मन में संदेह के बीज बोने लगता है और अपने बाकी हथकंडों का इस्तेमाल करने लगता है। यह सब वह इसलिए करता है कि आप उसके जाल में फंस सकें।

आपकी आँखें जितनी जल्दी खुल जाएँ, आपके लिए उतना ही अच्छा होता है।

  • Marroquí, M., & Cervera, P. (2014). Interiorización de los falsos mitos del amor romántico en jóvenes.
  • Gálvez Gómez, L. (2015). Proyecto de prevención de violencia de género en adolescentes.