प्राचीन ज्ञान से खुशी हासिल करने के 3 रहस्य

13 अप्रैल, 2019
प्राचीन ज्ञान में खुश रहने के कुछ शानदार टिप्स उपलब्ध हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं।

आजकल खुश रहने के लिए हमें जो सलाह दी जाती हैं, उनमें ज्यादातर नई बातें नहीं होती। बल्कि, ज्यादातर वे प्राचीन ज्ञान से आती हैं।

ऐसा लगता है, यह ज्ञान प्राचीन काल में संजोया गया था। फिर भी, जिज्ञासावश हमें अभी भी वर्तमान दुनिया में लाने की आवश्यकता है, क्योंकि हम अभी तक उनको आंतरिक रूप से व्यवस्थित नहीं कर पाए हैं जो हमें सिखाने की कोशिश करता है।

इस ब्लॉग में, हम प्राचीन ज्ञान के 3 रहस्यों को प्रकट करने जा रहे हैं जिन पर हर दिन अमल करना महत्वपूर्ण है

आखिरकार, अगर प्राचीन ऋषियों ने उन्हें अपनाया तो इसके पीछे जरूर वाजिब कारण रहे होंगे।

प्राचीन ज्ञान के रहस्यों पर अमल करना

1. सिर्फ उस पर नियंत्रण करें जो नियंत्रण योग्य हैं, बाकी बातों को नजरअंदाज करें

प्राचीन ज्ञान के रहस्यों में से यह पहली बहुत महत्वपूर्ण है। हम कई बार उन चीजों को नियंत्रित करना चाहते हैं जो हमारे नियंत्रित करने की क्षमता के भीतर नहीं हैं?

एक ऐसी समस्या का सामना होने पर जो हमें बर्बाद कर सकती है या हमें चिंता में जकड़ लेती है, अपने आपसे यह पूछना महत्वपूर्ण है कि क्या हम इस बारे में कुछ कर सकते हैं।

स्टोइक दर्शन ने कहा है : “क्या मैं इस समस्या के बारे में कुछ कर सकता हूँ? अगर मैं कर सकता हूं, तो मैं कार्रवाई करूंगा; यदि नहीं, तो मैं इसे स्वीकार करूंगा।”

हालाँकि कभी भी हम इतनी बुद्धिमानी से काम नहीं करते। हम घूम-फिर कर एक ही ढर्रे पर भागते हैं, खुद को थका देते हैं, अपने आत्मविश्वास को कमजोर करते हैं और चिंतित हो जाते हैं

आप हमेशा सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते। क्योंकि ऐसी घटनाएं हैं जो बस घटती हैं, और यह ठीक है। इसे स्वीकार करते ही आप भारी बोझ से मुक्त हो जाएंगे। क्योंकि कभी-कभी आप उन चीजों की जिम्मेदारी लेना चाहते हैं जिन्हें आप नियंत्रित नहीं कर सकते।

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कभी-कभी यह एक डर, असुरक्षा या अन्य समस्याओं का परिणाम होता है जो आपको आगे बढ़ने से रोकते हैं।

अपने आप को मुक्त छोड़ दें। यह समय स्वीकार करने का है, न कि उस पर आंखें मूंद कर लग जाने का जिसके बारे में आप जानते हैं कि आप उसे नियंत्रित नहीं कर सकते। सबसे अच्छी बातें तब होती हैं जब आप इन्हें सहज रूप से गुजर जाने देना सीख जाते हैं

2. स्वीकार करें और इनकार करना बंद करें

स्वीकर कर लेना जीवन की सबसे कठिन चीजों में से एक है, क्योंकि इसका मतलब कभी-कभी आपको पीड़ित की भूमिका अपनाने से रोकना होता है।

जब आप किसी बीमारी, स्थिति या जीवन के ऐसे वक्त को स्वीकार नहीं करते हैं जिसमें सबकुछ अच्छा नहीं है, तो यह आपके लिए अच्छा नहीं है।

यह स्थिति उतनी ही असंगत है जितनी यह देखने में लगती है। जैसे बारिश हो रही है, और इससे इनकार करना या इसके खिलाफ लड़ने की कोशिश करना। क्या इससे आप कुछ हासिल करते हैं? क्या आप स्थिति को बदल सकते हैं? उत्तर साफ़ है ‘नहीं’। अतः एकमात्र विकल्प है, जो हो रहा है उसे स्वीकार करना।

वास्तविकता का यह खंडन क्यों? यह आपकी उम्मीदों और भाग्य की आपकी धारणा के कारण होता है।

यह सब आपको पीड़ित और प्रतिरोधी बनाता है। आप पीड़ित नहीं हैं। दुनिया आपके खिलाफ नहीं है। चीजें बस होती हैं।

जो आप नहीं बदल सकते, उसे स्वीकार करें। ऋषियों के अनुसार,  ऐसे काम करना अपनी ऊर्जा को बर्बाद करना है।

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3. अपने जीवन के लिए आप जिम्मेदार हैं

आपके जीवन से दोष को दूर करने के लिए प्राचीन ज्ञान का तीसरा रहस्य बहुत महत्वपूर्ण है। लोग अपने माता-पिता को दोष देते हैं कि उन्होंने उन्हें कैसे बड़ा किया। लेकिन वयस्क अपने जीवन के नियंत्रण में हैं।

जैसा कि सेनेका ने कहा है :  “हम कहते हैं कि हमारे माता-पिता को चुनना हमारी शक्ति में नहीं था, कि उन्होंने हमें संयोग से जन्म दिया था। लेकिन हम चुन सकते हैं कि हम किस तरह के बच्चे बनना चाहते हैं।

बीते हुए पर पछतावा करने से आपको मदद नहीं मिलेगी। यह वर्तमान समय में आपको प्रभावित करने वाली कठिनाइयों के प्रति आपकी सहनशीलता का बहाना बनाने का एक तरीका है।

हालाँकि, अब हम वयस्क हैं। हमारे पास अपने माता-पिता से अलग रास्ते पर चलने की शक्ति है। हम अपने जीवन के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं, कोई दूसरा नहीं।

तो आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं?

आज ही वह दिन है, जबसे आपको उस पर से नियंत्रण पाने की कोशिश छोड़ देनी है, जिसके बारे में आप कुछ भी नहीं कर सकते। जैसी भी परिस्थितियाँ हैं, उन्हें स्वीकार करें और अपने जीवन की पतवार अपने हाथों में थामने की शुरुआत कर दें।

जुनून, खंडन और निंदा आपको तकलीफ के अलावा कुछ नहीं देंगे।

चित्र : क्रिस्चन स्कोलो

  • Boeri, M. D., y  Salles, R. “Los filósofos estoicos.” Ontología, Lógica, Física y Ética. Santiago de Chile: Ediciones Universidad Alberto Hurtado (2014).
  • Guevara, A. “Libro aureo de Marco Aurelio.” Zaragoza1529 (1994).
  • Seneca, L. De la brevedad de la vida. La Editorial, UPR, 2000.