अपने बच्चे को प्यार से सिखायें, डर और पाबंदियों के जरिये नहीं

जून 19, 2019
बच्चों की परवरिश खुशमिजाज़ और अच्छे इंसान के रूप में करने के लिए जरूरी है कि वे जो कुछ सीखें उनका आधार सम्मान पर टिका हो न कि रोक-टोक और बंदिशों पर। यह भी ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अगर वे अनुशासन का पालन करें तो इसलिए कि उनको वे नियम सही लगते हों, न कि इस वजह कि वे उनमें उनका खौफ़ है।

प्यार से सिखाना ज़िन्दगी में बहुत सी चीजों का बुनियादी आधार है। कई लोगों की सोच से अलग एक सख्त परवरिश बच्चों को ठीक तरह से बड़ा करने में सफलता की गारंटी नहीं देती है। इसलिए अपने बच्चों को प्यार से सिखायें, डर और पाबंदियों के जरिये नहीं।

चीख-चिल्लाहट और सख्त नियमों के आधार पर जो अनुशासन मनवाया जाता है, वह आगे चलकर डर और असुरक्षा की भावना पैदा करता है।

वास्तव में, यह जाननान चाहिए कि कैसे हम खुद ही यह मान लेते हैं कि “आज्ञाकारी और शांत बच्चा” ही अच्छा होता है और बहुत से परिवार भी ऐसा ही बच्चा चाहते हैं।

लेकिन कभी-कभी उस शांत बच्चे में आत्म-विश्वास की कमी और गहरा दुःख छिपा होता है। यह वह बच्चा है जिसने अपने आसपास इतनी दीवारें खड़ी की होती हैं, जिससे उसे अपना जीवन सिर्फ जेल लगता है।

इसके अलावा, उन बच्चों का दिलो-दिमाग किसी भी मामले में आगे बढ़कर पहलकदमी करने में असमर्थ हो जाता हैं। वे हर समय दूसरे लोगों से ही उन्हें यह बताने की उम्मीद करते हैं कि वे क्या कर सकते हैं या क्या नहीं।

खुशहाल बच्चा वह है जो नई नई खोज करता है, खेलता है, हंसता है और खूब बातें करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि डर और सख्ती विकास और आत्म-विश्वास के पंखों को क़तर देते हैं।

तो जब आपको यह चुनना हो कि आप अपने बच्चों के लिए किस तरह की पेरेंटिंग चाहते हैं, तो आपको वह चुनना चाहिए जो उन्हें सच्चाई और ईमानदारी से बढ़ने देगा। ऐसा कुछ जो उन्हें दुनिया में सम्मान से रहने में सक्षम बनाये, जिससे वे खुद खुश रहने के साथ-साथ दुनिया में भी खुशियां बाँट सकें।

नीचे हम आपको सोच और विचार करने के लिए कुछ आसान दिशानिर्देश देना चाहेंगे।

शिक्षा में बंदिशें

हर कोई ऐसा बच्चा चाहता है जो उनकी बात सुनता हो, जो उन्हें खुश करना चाहता हो और उनके तय किए गए लक्ष्य को पूरा करे।

हालांकि यह सच है कि ऐसा सब चाहते है, पर यह न भूलें कि ऐसा व्यवहार दूसरों के तालमेल के अनुरूप होना चाहिए।

नियमों का पालन करना और उन्हें समझना -ये दोनों बातें एक दूसरे के समानांतर होनी  चाहिए।

  • बच्चे को यह समझ में आना चाहिए कि उससे क्या अपेक्षा की जाती है और आप उसके ऊपर नियमों को क्यों लागू कर रहे हैं।

  • मैं वह करता हूँ जो मेरी माँ मुझसे कहती है, क्योंकि वह जानती है कि मेरे लिए सबसे अच्छा क्या है। मैं हर रात अपने खिलौनों को एक तरफ हटाकर रखता हूँ क्योंकि मुझे अपना कमरा साफ रखना चाहिए। जब दूसरे बात करते हैं तो उन्हें सम्मान देते हुए मैं चुप हो जाता हूँ, इसलिए भी कि उनकी बातें सुन सकूँ।

बच्चों को डर या सजा से नियमों का पालन नहीं करना चाहिए। जब शिक्षा की बात आती है तो बिहैवियरल साइकोलोजी हमेशा काम नहीं करती है।

अगर आपका बच्चा आपके चिल्लाने और तानों का आदी हो जाता है, तो वह अपने मन में माता-पिता के प्रति डर और क्रोध पैदा कर लेगा।

आगे हम इस बारे में विस्तार से समझायेंगे।

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डर के जरिये दी जाने वाली शिक्षा दुखी करती है

सख्त परवरिश: डरा हुआ बच्चा

जन्म के एक महीने बाद से सात वर्ष की उम्र के बीच का समय शुरुआती बचपन का होता है। इस दौरान जो कुछ होता है वह भविष्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

  • हर माता-पिता चाहते हैं, जब भी वो कुछ कहें तो उनका बच्चा उनकी बात सुने और माने।
  • ये बच्चों को परिवार के रंग-ढंग में बसने में मदद करता है, साथ ही साथ उन्हें सुरक्षित भी रखता है

लेकिन बच्चे हमेशा सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ना चाहते हैं, खुद को साबित करने के लिए और आपको भी

  • हर बार जब वे सीमाओं से बाहर जाते हैं, उन्हें गंभीर सजा, डाँट-फटकार या अपमान जनक बातों का सामना करना पड़े तो बच्चा दो तरीके की प्रतिक्रिया दे सकता है।

  • यह उनके गुस्से को भड़कायेगा, जिससे वे आपको और चुनौती देंगे या अंदर ही अंदर दब कर रह जायेंगे।

  • एक बच्चे को अपने बचपन में हर दिन डर लगते हुए नहीं बिताना चाहिए।

  • डर उनके आत्म-विश्वास को मिटा देता है और युवा, परिपक्व होते हुए दिमाग पर अनचाहे दबाव डालने का कारण बनता है।

  • सज़ा के जरिये पालन पोषण करने से बच्चा केवल बाहरी पहचान पर ध्यान केंद्रित करता है। आप एक ऐसा व्यक्ति बनाते हैं जिसके पास न आत्मविश्वास होता है न ही निर्णय लेने की शक्ति।

हर कोई जो अपने परिवार के डर से दुनिया को देखते हुए बड़ा होता है, वह बड़े होकर दुखी रहता है।

“जो लोग मुझसे प्यार करते हैं, मुझे उनसे डर लगता है, इसलिए मुझे इस दुनिया में खुद को बचाने की ज़रूरत है।”

यह भी देखें: बच्चों में विद्रोह की भावना को कैसे रोकें 

प्यार और सम्मान के साथ सिखायें

सख्त परवरिश: खेलती हुई बच्ची

  • सम्मान के साथ सिखाने का मतलब है, बच्चे को हर वक़्त बतायें कि उनसे क्या उम्मीद की जाती है। साथ ही, इसका मतलब है, उन्हें खुद की पहचान बनाने के लिए प्रोत्साहित करना, ताकि वे आपके सुरक्षा के दायरे में रह कर दुनिया की खोज करें।

  • प्यार के साथ सिखाने का मतलब है, चीखने-चिल्लाने की कोई ज़रूरत नहीं है। इसके बजाय बहस भी तर्कपूर्ण ढंग से और सहज माहौल में करना।

  • अगर आप अपने बच्चों को प्यार से आज्ञाकारी होना सिखाना चाहते हैं, तो आपको भी उनकी बात सुननी होगी। उनके विचारों पर ध्यान दें और फिर ज़रूरत के हिसाब से सुझाव दें, स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन करें।

  • यह कोशिश करें कि आपके बच्चे परफेक्ट हो जाएँ। आप बच्चों को ख़ुशी-ख़ुशी बड़ा करणा और उन्हें परिवार और समाज के नियमों का ज्ञान करना आपका लक्ष्य होना चाहिए।

  • सिखाने के लिए आपको अपने बच्चे को समझाने की जरूरत है। अगर आप उन्हें सज़ा देने और मीन-मेख निकालने पर ध्यान देते हैं, और सिर्फ यह बताते रहते हैं कि वे क्या गलत कर रहे हैं, तो आप किसी ऐसे व्यक्ति को बड़ा करेंगे जिसमे दृढ़ता की कमी होगी ।

  • जब बच्चे दुर्व्यवहार करें तो बहुत कठोर होने की बजाय, उन्हें समझायें कि उन्होंने क्या गलत किया है और वे कैसे ठीक कर सकते हैं।

  • याद रखें कि बच्चे से ढेर सारी मांगें करना अच्छा नहीं है। आप अपने बच्चे को ऐसा नहीं बनाना चाहते हैं जो हद से ज्यादा विनम्र और चुप हो।

अपने बच्चे के सहज और असली प्रतिभाओं पर ध्यान केंद्रित करें, ताकि वे आत्मविश्वास महसूस कर सकें।

सख्त परवरिश: बच्चा खिड़की से बाहर देखता हुआ

उन्हें सज़ा देने के बजाय आप अपने बच्चे के साथ “कनेक्ट” करना सीखें। यदि आप उनकी जरूरतों को समझते हैं, तो आप उन्हें दिन-प्रतिदिन बढ़ने में बेहतर तरीके से मदद कर सकते हैं।

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