पेरिफेरल वेनस कटडाउन : जानिये ये बातें

02 अप्रैल, 2020
पेरिफेरल वेनस कटडाउन की सिफारिश उन रोगियों के लिए की जाती है जिनकी नसों में कैनुला डालने की ज़रूरत होती है पर उनमें इस प्रक्रिया को त्वचा के रास्ते नहीं किया जा सकता।

पेरिफेरल वेनस कटडाउन एक सर्जिकल प्रोसेस है जिसका मकसद हाथ-पैरों या गर्दन की नस को एक्सपोज करना होता है। इसका उद्देश्य एक कैनुला घुसाना होता है जो छोटा हो सकता है या जो वेना केवा या दायें एट्रियम तक भी जा सकता है

इसमें एक वीनस एक्सेस पोर्ट होता है जो मरीजों की वीन्स तक सुरक्षित और स्थाई पहुँच की सहूलियत देता है।

इसलिए एक्सपर्ट पेरिफेरल वेनस कटडाउन की सिफारिश उन रोगियों के लिए करते हैं जिनकी नसों में कैनुला डालने की ज़रूरत होती है पर उनमें त्वचा के रास्ते पहुँच नहीं पायी जा सकती।

मेडिकल प्रोफेशनल अक्सर इसका उपयोग उन मरीजों में करते हैं जिन्हें इंजेक्शन के जरिये दी जाने वाली दवाओं की लगातार ज़रूरत होती है, उदाहरण के लिए ऐसे मरीज जिन्हें कीमोथेरेपी मिल रही है। इस प्रोसिड्योर को फ्लेबोटोमी (phlebotomy) भी कहा जाता है।

पेरिफेरल वेनस कटडाउन के फायदे

पेरिफेरल वेनस कटडाउन एक खुली सर्जिकल प्रक्रिया है। उसी प्रक्रिया में मेडिकल प्रोफेशनल सिफेलिक नस को खोलते और उस तक पहुँचते हैं।

यह निम्नलिखित विशेषताओं के कारण रोगी के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है:

  • एक्सपर्ट नस को प्रत्यक्ष रूप से देखते हुए लंबे कैथेटर घुसा सकते हैं
  • इस तरह वे कीमोथेरेपी, न्यूट्रीशन या हाइपरटोनिक सॉल्यूशन भी दे सकते हैं
  • वे कैथेटर की नोक को नस के केंद्र में रख सकते हैं
  • कैथेटर का उपयोग करके डॉक्टर सेन्ट्रल वीनस प्रेशर रिकॉर्ड कर सकता है
  • कैथेटर लंबे समय तक उस जगह रह सकते हैं, यहां तक ​​कि एक साल भी

इसके अलावा, यह बताना ज़रूरी है कि चूंकि पेशेवर नोक को एक बड़ी नस या राईट ऑट्रियम में रख सकते हैं, इसलिए वे स्केलेरोसिस (sclerosis) और फ्फेबाइटिस (phlebitis) के विकास को भी रोक सकते हैं

दोनों स्थितियाँ तब पैदा होती हैं जब एक छोटे कैथेटर का उपयोग करके ट्रीटमेंट को पेरिफेरल वीन में ब्लड इंजेक्शन के जरिये डाला जाता है।

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पेरिफेरल वेनस कटडाउन टेकनीक

पेरिफेरल वेनस कटडाउन टेकनीक

इस टेकनीक को सही ढंग से अंजाम देने के सबसे पहले मरीज की पोजीशन पर गौर करना ज़रूरी है। यह प्रक्रिया के लिए डॉक्टर द्वारा चुने गए स्थान पर निर्भर करेगा।

जब वयस्कों की बात आती है, तो आमतौर पर डॉक्टर जो जगह चुनते हैं, वह है बाँह का एंटेरोमेडिकल अंग। आम आदमी के शब्दों में कहें तो कोहनी के ऊपर। उद्देश्य बैसिलिस नस पर काम करना है। वैसे दूसरी जगहें भी हैं:

  • गर्दन की बाहरी जगलर नसें
  • डेल्तोपेक्टोरल ग्रूव में सेफालिक नस
  • जाँघ पर सैफेनस आर्च

यदि रोगी एक बच्चा है, तो प्रक्रिया सैफेनस नस पर केंद्रित होगी। इसका अर्थ है टखने के भीतरी और औसत दर्जे के मैलीओलस के ऊपर 0.4 इंच (एक सेंटीमीटर)।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि अगर रोगी की स्थिति अनुमति दे तो सर्जन को हमेशा पूरी प्रक्रिया की व्याख्या करनी चाहिए और शुरू करने से पहले उनकी मंजूरी लेनी चाहिए।

स्थान चुनने के बाद जहां डॉक्टर रोगी को सही पोजीशन में रखेंगे। यदि डॉक्टर इसे हाथ या डेल्तोपेक्टोरल ग्रूव में करने जा रहा है, तो वे हाथ को हाथ की स्थिति में सुरक्षित करेंगे।

पेशेवर को हमेशा सही कपड़े पहनने चाहिए, जिसमें एक कैप, मास्क, स्टेराइल गाउन और दस्ताने शामिल हैं।

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जटिलतायें


आम तौर पर इस तकनीक से जुड़ी जटिलताएं सर्जिकल प्रक्रिया पर आधारित होती हैं। सर्जिकल रिस्क कैथेटर और पोस्टऑपरेटिव जोखिम से जुड़े हैं जो आमतौर पर पोस्टऑपरेटिव केयर के दौरान होता है।

सबसे पहले सबसे आम सर्जिकल जटिलताएं ये हैं:

  • शिरा की पहचान करने या उसकी चैनलिंग करने में असमर्थता या कठिनाई
  • शिरा का फटना या धमनी का घाव – इस मामले में वाकई गंभीर नतीजे हो सकते हैं
  • नस टूटना, चोट लगना, या धमनी बंधाव
  • कैथेटर को हिलाने में कठिनाई

इसके अलावा, पोस्टऑपरेटिव जटिलताएं शिरा में कैथेटर के प्लेसमेंट पर आधारित होती हैं। यह देखभाल के अभाव या लंबे समय तक वहां रहने के कारण हो सकता है। जोखिम ये हैं:

  • शिरा की घनास्र अंतःशल्यता (Venous thromboembolism)
  • फ़्लेबाइटिस – यह समस्या तब पैदा होती है जब कैथेटर को लंबे समय तक नस में छोड़ दिया जाता है
  • चीरे की जगह पर मवाद भरना – यह आमतौर पर संक्रमित हेमटॉमस के कारण होता है जो सबसे खराब स्थिति में, सामान्यीकृत सेप्सिस को जन्म दे सकता है।

इसलिए अच्छी पोस्टऑपरेटिव केयर ज़रूरी है। उदाहरण के लिए डॉक्टर स्टेराइल गॉज से कैथेटर को संभालने की सलाह देते हैं। इस तरह बैक्टीरियल कॉलोनी से बचा जा सकता है और कैथेटर को संभालने के दौरान या रोगी को ले जाने के दौरान स्थिर रहता है।

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