वे गलतियाँ जो बच्चों के बात न मानने पर पैरेंट करते हैं

22 जनवरी, 2020
माता-पिता द्वारा की गई एक मामूली गलती इस बात का भूलना है कि वे अपने बच्चों के लिए मिसाल होते हैं। बच्चे वह सब कुछ दोहराते हैं जो उनके माता-पिता करते हैं।

बहुत छोटे बच्चों की परवरिश कोई आसान चीज नहीं है। इसलिए बच्चे जब उनकी बात नहीं मानते तो कुछ पैरेंट का इस गलती के जाल में पड़ना अस्वाभाविक नहीं है।

जिम्मेदारियों और स्ट्रेस के कारण माता-पिता बेलगाम बच्चों पर आसानी से कुपित हो जाते हैं। अक्सर उनके बच्चे डिसिप्लिन का पालन नहीं करते हैं और हमेशा उनका विरोध करते हैं।

हालांकि इस समस्या में पड़ने पर इन सामान्य गलतियों से बचने के लिए एक गहरी साँस लेना ज़रूरी है, क्योंकि यह समस्या उन तमाम चीज़ों के खिलाफ जा सकता है जो बच्चों को सिखाई गई है।

गलतियाँ जो पैरेंट करते हैं

1. मैं यहाँ इंचार्ज हूँ!

छोटे बच्चों के नखरे, पलट कर जवाब देने या उनके अवज्ञाकारी होने से माता-पिता समझते हैं उनकी अवहेलना हो रही है।

हालाँकि सिर्फ इसलिए कि बच्चे अपने पैरेंट का विरोध करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वे जरूरी तौर पर उन्हें टाल रहे हैं। हो सकता है जो उन्हें बताया गया है वे भूल गए हों या हो सकता है उन्हें बहुत अच्छी तरह से समझ में नहीं आया हो।

वयस्कों के रूप में हम ज्यादातर चीजों को साफ़ तौर पर देखते हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे अभी सिर्फ बच्चे हैं।

इसे अपने अधिकारक्षेत्र पर हमले के रूप में देखने के बजाय ज़रूरी है कि हम अपने बच्चों के साथ बैठकर बातचीत करें। इस तरह हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वे समझें कि उन्हें क्या बताया जा रहा है।

एक और गलती पैरेंट अक्सर करते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अनुशासन का पालन करें। हालाँकि उन्होंने यह नहीं परखा है कि बच्चे क्या नियमों को समझे गए हैं और उसका उनके लिए कुछ मतलब भी है।

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2. उनके लेवल पर उतर आना

माता-पिता की सबसे लगातार गलतियों में से एक है, बच्चों के साथ उसी तरह से गुस्सा करना या व्यवहार करना है जैसे बच्चा कर रहा है।

इस तरह का व्यवहार सिर्फ अधिकार की कमी को ही दिखलाता है, लेकिन यह भी दर्शाता है कि वे अपने पर नियंत्रण खो रहे हैं।

अगर उन्हें समझने के बजाय उन पर हमला किया जाए तो बच्चे गुस्सा करेंगे, निराश और नाराजगी महसूस करना शुरू कर देंगे।

अगर पैरेंट अपने बच्चों को शिक्षा देना  चाहते हैं, तो उसका यह तरीका नहीं है। अगर उन पर हर वक्त चीखा-चिल्लाया जाए तो बच्चे संदेश को समझ नहीं पाते।

इसके अलावा, यह सिर्फ बच्चे को स्ट्रेस देता है। बहसबाजी से आप बस एंग्जायटी भरा माहौल बना रहे हैं।

3. नियम वैकल्पिक होते हैं

उस दृश्य की कल्पना करें: सुपरमार्केट में एक बच्चा जिसके माता-पिता ने उन्हें अभी बताया है कि आज वह मिठाई नहीं खा सकता।

हालाँकि, बच्चे को इस वक्त उसकी चाहत हो रही है। इस तरह वह एक टैंट्रम करता है, सुपरमार्केट में फर्श पर इधर-उधर लोटता है, और चिल्लाना शुरू करता है: “मुझे मिठाई चाहिए, मुझे मिठाई चाहिए! ”

माता-पिता शर्मिंदगी महसूस करते हैं, इसलिए वे बच्चे को मिठाई दिला देते हैं।

इस तरह बच्चा समझता है कि अपने पैरेंट के सामने ऐसी टेकनीक अपनाकर नियमों को तोड़ा जा सकता है।

अगर पैरेंट ने एक बार भी सरेंडर किया तो वे उन पर काबू खो देंगे। नियमों का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। अन्यथा बच्चे में यह बात घर कर जायेगी नियम टूटने के लिए होते हैं।

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4. स्पष्ट बातों की ओर से भी अपनी आँखें बंद रखना

हमारे साथ ऐसा कितनी बार हुआ है? कई बार हम जो पसंद नहीं करते उस ओर से आँखें मूँद लेते हैं। फिर हम मुंह मोड़ लेते हैं जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं।

ऐसा होता है। अगर आपका बच्चा एक बार आपकी बात न माने और आप इस बारे में कुछ नहीं कहते या करते, तो वे नहीं समझ पाते कि आप नाराज क्यों हो रहे हैं। फिर अगली बार आप खुद को ऐसी ही स्थिति में पाने वाले हैं।

ऐसा करके हम अपने बच्चों को यह आभास दे रहे हैं कि हम दिन और हालात के मुताबिक़ रुचि और अरुचि ग्रस्त हो सकते हैं।

इससे बच्चों को यह महसूस होगा कि वे जो भी कर रहे हैं उसमें हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है। यह सेल्फ कॉन्फिडेंस में कमी जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है जो भविष्य में जल्दी ही उन पर असर डालेगा।

5. मैं तुम्हारा पैरेंट हूँ, इसलिए यह कर सकता हूँ!

बेशक यह सबसे बड़ी गलतियों में से एक है जो पैरेंट करते हैं: उन नियमों के बारे में अस्पष्ट होना जो वे अपने बच्चों पर लगाते हैं।

उदाहरण के लिए, अगर कोई अभिभावक बच्चे को अपने पैर टेबल पर न रखने के लिए कहे, और खुद इसे करें तो बच्चा समझ नहीं पाता है और विद्रोह करना शुरू कर सकता है।

जब घर पर नियम बनते हैं तो परिवार में सभी को उन पर अमल करना चाहिए। यह सिर्फ एक मिसाल देने के लिए नहीं है, बल्कि हम जो कह रहे हैं उसमें हमें सुसंगत होना चाहिए।

अगर हम खुद वह नहीं करते तो हम किसी बच्चे से ऐसा करने के लिए कैसे कह सकते हैं। लेकिन पैरेंट का मनोभाव यह होता हैं कि हम कह रहे हैं तो ऐसा होना चाहिए “क्योंकि मैंने ऐसा कहा था” या “मैं यहाँ इंचार्ज हूँ!”