निश्चयात्मक बनें और "अब बस" कहना सीखें

21 मई, 2018
यह महत्वपूर्ण है कि हमें मालूम हो, कब विरोध करना है, और कहना है, "अब बस।" यह आपके व्यक्तित्व को ठोस आकार देता है।

पिछली बार आपको कब तेज आवाज़ में कहना पड़ा था, “अब बस?” यह करना आसान नहीं है। इसके लिए हिम्मत चाहिए। निश्चयात्मक बनें! इससे भावनात्मक स्वतंत्रता के दरवाज़े खुलते हैं।

ज्यादातर लोगों की धारणा से उलट वक्त के साथ अक्सर हम बदलते हैं। हमारे व्यक्तित्व, मूल्यों और रवैये में बदलाव आता है। इससे हम जीवन की समस्याओं के साथ तालमेल बिठा पाते हैं।

कई बार बदलने की बजाय लोग वैसे का वैसा बने रहते हैं। इसका असर उनके दिमागी स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। हमें बदलाव से डरना नहीं चाहिए। उसे खुशी और अंदरूनी सुकून पाने का नया अवसर समझना चाहिए। ऐसा सोचना चाहिए कि यह हमारी भलाई के लिए है।

आज हम इस विषय पर बात करने के लिए आपको आमंत्रित करना चाहते हैं।

“अब बस!” कहना सीखना: एक स्वतंत्रत आचरण

जरा ठहरकर सोचें, दिन में हम कितनी बार “हाँ” और कितनी बार “ना” कहते हैं। आप देखेंगे, “हाँ” की संख्या “ना” से ज्यादा होगी। इनमें से सभी “हाँ” ईमानदारी और सच्चाई पर आधारित नहीं होती।

बचपन से हम कुछ शिष्टाचार सीखते हुए बड़े होते हैं। कोई हमसे कुछ मांगे तो हमें ‘हाँ’ कहना चाहिए। कुछ लेने पर ‘धन्यवाद’ कहना चाहिए। हर परिस्थिति में ‘संजीदा’ होना चाहिए।

ये बहुत आदर्श आचरण हैं। ये हमें एक अच्छा और आदर्श व्यक्ति बनाती हैं। लेकिन हमें अपने बच्चों को निश्चयात्मक बनने का तरीका भी सिखाना चाहिए। हम क्यों चाहते हैं कि वे निश्चयात्मक बनें? आइये देखें।

निश्चयात्मक बनें और स्वतंत्रता प्राप्त करें

क्यों ज़रूरी है कि हम निश्चयात्मक बनें

निश्चयात्मक होने का अर्थ है, अपने अधिकारों, जरूरतों और दृष्टिकोण की रक्षा करना है। वह भी दूसरों को बराबर सम्मान देते हुए।

  • लेकिन यह कोई सरल कार्य नहीं है। हम निश्चयात्मक बनें, इसके लिए पहले हमें अपनी सीमाओं को निश्चित करना होता है। अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करनी होती है।
  • अपनी सीमाओं को जान लेने के बाद हम उनकी ज्यादा बेहतर ढंग से रक्षा कर सकते हैं।
  • यह सम्मान करने और सम्मान प्राप्त करने से जुड़ा है। हमें दूसरों की बात को सुनने का हुनर आना चाहिए। इसके साथ ही अपनी जरूरतों के बारे में बताना भी। कौन सी बात हमको अच्छी लगती है, किस बात से हमें दुःख होता है, यह साफ-साफ व्यक्त करना भी जरूरी है।
  • व्यक्तिसूचक सर्वनाम “मैं” का उपयोग करने से न डरें। (“मैं आपको खुद से इस तरह से बात करते हुए नहीं सुनना चाहती।” “मैं इस स्थिति को और नहीं झेल सकती। यह मेरा नुकसान कर रहा है।”मुझे ऐसा लगता है, तुम मेरी पर्याप्त कद्र नहीं करते, मेरा सम्मान नहीं करते।”

अब बस, कहने के ये परिणाम हो सकते हैं

हर बदलाव के साथ भय और असुरक्षा की भावनाएं जुड़ी होती हैं। ये उन नतीजों की कल्पना से पैदा होती हैं, जो हमारे व्यवहार को बदलने से हो सकती है।

  • पारिवारिक जीवन में अब बस कहना जटिल मामला होता है। यदि परिवार के सदस्यों की नकारात्मक प्रतिक्रिया हो तो वे हमें अस्वीकार कर सकते हैं।
  • कार्यस्थल में किसी असहनीय स्थिति के लिए बस कहने से हमारी नौकरी जा सकती है।
  • बच्चों का व्यवहार ठीक न हो तो हम बस कह सकते हैं। लेकिन परिणामस्वरूप वे कह सकते हैं कि “वे हमें प्यार नहीं करते हैं”।
  •  हमें नकारात्मक परिणामों से डर लगता है। लेकिन हमें उनके बारे में सोचकर डरना नहीं चाहिए। उसकी जगह यह विचार करना चाहिए कि हम किसी नकारात्मक स्थिति का सामना कैसे करेंगे।
  • अक्सर किसी खराब स्थिति में रहने की जगह “अब बस” कह देना ज्यादा बेहतर होता है। ऐसा करने से कई बार नए रास्ते खुल जाते हैं। आपको ऐसी राह मिल जाती है जिसके बारे में आप सोच भी नहीं सकते थे। इसलिए दृढ निश्चयात्मक बनें और इसके फायदों का लाभ  उठायें।
निश्चयात्मक बनें और अब बस कहना सीखें

अपने मूल्यों से जुड़े रहने की जरूरत

हमारी भावनाओं की पवित्रता अपने मूल्यों और विश्वासों के अनुरूप आचरण कर पाने पर निर्भर करती है।

अगर हम हमेशा दूसरों की बात मानें, हर समय दूसरों को खुश करने की कोशिश करें, तो हम अपना अस्तित्व खो देंगे। आईने में अपने को देखकर पहचान भी नहीं पाएंगे।

  • यह जीवन जीने का तरीका नहीं है। बेशक, हम सब जानते हैं, जो हम चाहते हैं उसे पाना हमेशा संभव नहीं होता। दूसरी तरफ हमेशा अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करना भी ठीक नहीं।
  • हमें अपने और दूसरों के प्रति शिष्ट, सिद्धांत प्रिय और अटल होना चाहिए।
  • साथ में जीवन व्यतीत करने के लिए हमें दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। उसके साथ अपने दिल की बात भी सुननी चाहिए।
  • किसी भी कीमत पर हम अपने मन की शांति और अपने गौरव को नहीं खो सकते। अगर अपने जीवन में हम खुद पिछले पायदान पर बने रहें और दूसरों को हावी होने दें, तो हम आत्म-सम्मान खो देंगे। इससे हमारी अपनी छवि को नुकसान होगा।

अपने मूल्यों पर अटल रहें. अपने अंदर की आवाज़ सुनें। और जरूरत पड़ने ” अब बस करो” कहने में न झिझकें।

लोग बदलते हैं। लेकिन यह रातोंरात नहीं होता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती है। यह सतत प्रक्रिया है, जो विकास और परिपक्वता की ओर उठाये गए छोटे-छोटे ढेर सारे कदमों से बनी है।