हमारा अपना दर्द प्रियजनों का दिल न दुखाये

21 मई, 2018
आपके लिए इस समय मानना आसान नहीं होगा, लेकिन यह सही है कि वक्त के साथ सब घाव भर जाते हैं। जरा अपने घावों को भरने का समय देकर देखें। साथ ही ध्यान रखें, कहीं आपका अपना दर्द प्रियजनों का दिल न दुखा दे।

हमारा अपना दर्द बहुत ही निजी मामला होता है। इसे ठीक होने में वक्त लगता है। मन की शांति और संतुलन धीरे-धीरे वापस आते हैं। फिर ये आपमें ताकत और आशावादी दृष्टिकोण देते हैं। इससे आपको सच्चाई का सामना करने में मदद मिलती है।

सबके जीवन में व्यक्तिगत परेशानियों का दौर आता है। लेकिन अपनी मुसीबतों के लिए हमें दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए। ऐसे समय में कोशिश हो कि हम दूसरों को दुःख न दें, उन्हें अपने दुःख का कारण न मानें।

ऐसा अक्सर होता है, जब अपने भावनात्मक दर्द का शिकार होकर दूसरों को दुःख देते हैं। अवसाद की स्थिति आती है। हमारा हमारा अपना दर्द निराशा, उदासीनता और गुस्से के रूप में व्यक्त होता है। ऐसे में अनजाने में ही हम अपनी समस्याओं और बीमारियों के लिए दूसरों को दोष देने लगते हैं।

हमें यह समझना चाहिए, हम अपनी भावनाओं के खुद आर्किटेक्ट हैं। हमें दूसरों को तकलीफ दिए बिना अपने जीवन के अंधेरों का सामना करना है। अपनी चैन और शांति को वापस पाने के लिए हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पाना चाहिए।

आइये हम इस पर थोड़ा ध्यान और दें!

हमारा अपना दर्द एक दीवार है जिसे तोड़ना है

आपने ऐसा वाक्य सुना होगा। द्वेष से भरा इंसान जब अपनी कड़वाहट को लोगों में नहीं फैला पाता तो उसे निराशा होती है। हम सबने इसे  अनुभव किया है। कई लोग अपनी निराशा और दुःख के बारे में बेरोक-टोक बताते जाते हैं। उनसे मिलकर पता चलता है, वे अपने भावनात्मक दर्द से परेशान हैं। दरसल हमारा अपना दर्द हमारे चारों ओर एक दीवार बना देता है। यह प्रक्रिया कुछ खास हालातों से शुरू होती है।

हम सब गिरते हैं। हमें निराशा और धोखा मिलता है। जब कोई हमें चोट पहुंचाता है तो हमें गुस्सा आता है।

  • धीरे-धीरे यह गुस्सा दुःख और इमोशनल स्ट्रेस में बदल जाता है। गुस्से में लोग किसी न किसी को दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं।
  • सबको ऐसी परिस्थितियों का समाना करना पड़ता है। कुछ लोग अपने भावनात्मक दर्द को सँभालने में ज्यादा सक्षम होते हैं। कुछ लोगों के लिए यह थोड़ा कठिन होता है।
  • लोग अपने को सुरक्षित रखने के लिए अपने चारों ओर दीवारें खड़ी करते हैं। उनके भीतर से दूसरों पर आक्रमण भी करते हैं।
हमारा अपना दर्द

अपनी भावनाओं को समझें जिससे उन पर बेहतर नियंत्रण पा सकें

आजकल खिन्न होना एक आम बात हो गयी है। लोगों ने भावनात्मक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और अपनी देखभाल को प्राथमिकता देना छोड़ दिया है।

  • हमें अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहिए। किस बात से दुःख हो रहा है, हम किस वजह से परेशान हैं, इन्हें बताने की क्षमता को भावनात्मक स्वतंत्रता कहते हैं। ऐसे नकारात्मक भावों को छिपाने से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
  • निष्पक्षता का अर्थ घृणा, नाखुशी और दुसरी नेगेटिव भावनाओं को छोड़ पाने की ताकत है। ये भावनाएं हमें कैद करती हैं और नुकसान पहुंचाती हैं।
  • कई बार हमारा अपना दर्द एक ठोस रूप ले लेता है। लेकिन अपने भावनात्मक दर्द को कम करने के लिए हमें लोगों को क्षमा करना चाहिए। इससे हम मुक्त होकर आगे बढ़ सकते हैं।
  • अपनी देखभाल करना स्वार्थी होना नहीं है। यह एक कला है। ये एक अच्छे आतंरिक वार्तालाप को बढ़ावा देती है। यह अपनी जरूरतों को जानने और डर को पहचानने में हमारी मदद करती है, अपने भावनात्मक दर्द और चिंताओं के बारे में जानने में मदद करती है।
  • अच्छी तरह से अपनी देखभाल करने से हमारा आत्म-सम्मान मजबूत होता है। इस भावना का असर हमारे आस-पास के लोगों पर होता है।

समय हर घाव को भर देता है

कभी भी अपने भावनात्मक दर्द को पकड़ कर न रखें, न ही किसी से नफरत करते रहें। नकारात्मक भावनाएं हमें कष्ट देती हैं। इनके कारण हम बीमार भी पड़ सकते हैं।

  • गुस्से को जकड़े रहने में भलाई नहीं होती। परेशानियां झेलते समय ध्यान रखें कि आपकी बातें और व्यवहार सही हों। कई बार अनजाने में हम दूसरों के मन में अलगाव की भावना पैदा कर देते हैं।
  • हमारे साथ वाले लोगों को हमारे प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। हमें सहारा देना चाहिए।
  • हमारे अंदर उनकी सहायता स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए। हमें उन्हें शक्ति और संबल का स्रोत समझना चाहिए।
हमारा अपना दर्द

समय के साथ सभी घाव भर जाते हैं। पुराने घाव हमारी यादों में रह जाते हैं। बाद में अतीत का हमारा अपना दर्द  हमें याद जरूर आता है पर उसके साथ पुराने दर्द की टीस नहीं बची रहती।