जीन म्यूटेशन क्या होता है?

07 अप्रैल, 2020
जीन म्यूटेशन हमेशा बीमारियों का कारण नहीं बनता। कभी-कभी DNA  में होने वाले बदलाव किसी आदमी की ज़िन्दगी पर असर डालने वाले बदलाव के रूप में खुद को प्रकट नहीं करते। इस आर्टिकल में और जानें।

बायोलॉजी में म्युटेशन का अर्थ किसी भी जीव, बैक्टीरिया या वायरस के जीनोम को गढ़ने वाले छोटी इकाइयों जिन्हें न्युक्लियोटाइड कहते हैं, उनके सीक्वेंस या क्रमिक संरचना में आने वाला बदलाव है। इससे उसमें अचानक ऐसा गुण आ सकता है, जो पूरे इवोल्युशनरी चेन में उसकी पिछली पीढ़ियों में नहीं था। इसी कारण कभी-कभी ऐसी महामारी फैलती है, जिसे पहले नहीं देखा गया था। क्योंकि म्युटेशन के जरिये किसी सूक्ष्मजीव की नयी स्ट्रेन पैदा हो जाती है, जो अपने पूरे कुल से अलग मनुष्य को संक्रमित कर लेने की क्षमता या मारक क्षमता हासिल कर लेता है। इस तरह जीन म्यूटेशन किसी प्राणी के जीनोटाइप में होने वाले बदलाव हैं।

जीनोटाइप दरअसल जीव की आनुवंशिक सूचनाओं का भण्डार होता है। यह उसके DNA या डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड में संचित होता है। जैसा कि सब जानते हैं, डीएनए में व्यक्ति की वंशानुगत सामग्री होती है।

जीन के म्यूटेट करने पर कई तरह के प्रोटीन बनते हैं, जो व्यक्ति के मूल फेनोटाइप को बदल देते हैं। फेनोटाइप व्यक्ति के जीनोटाइप और उसके बाहरी पर्यावरण के बीच आपसी द्वंद्व-संघर्ष  के परिणामस्वरूप बनने वाली उसकी शारीरिक विशेषताओं का समूह है। इन्हें बाहर से देखा जा सकता है, जैसे कि शरीर, आँखों या बालों का का रंग-रूप, बनावट आदि। जीन म्युटेशन के बाद बनने वाला नया फेनोटाइप आमतौर पर उसके मूल रंग-रूप के मुकाबले कम अनुकूल होता है। पर ऐसा हमेशा नहीं होता।

हम कहते हैं, ऐसा हमेशा नहीं होता। भले ही जीन म्यूटेशन के कारण कई बीमारियां उसमें विकसित हो सकती हैं, लेकिन इसके कारण ही पृथ्वी पर प्राणियों का बायोलॉजिकल एवोल्यूशन संभव हो पाया है। म्युटेशन से ज़िंदा प्राणियों को अपने वातावरण के अनुकूल बनने, नई प्रजातियों के पैदा होने और मौजूदा कुछ प्रजातियों के विलुप्त हो जाने में मदद मिलती है

न्यूट्रल म्युटेशन (neutral mutations) भी होते हैं। न्यूट्रल म्युटेशन किसी व्यक्ति को नुकसान या लाभ नहीं पहुँचाता।

इस लेख में हम अलग-अलग तरह के जीन म्युटेशन और उनसे जुड़ी कुछ बीमारियों के बारे में बात करेंगे।

जीन म्यूटेशन कहां हो सकता है?

जीन म्यूटेशन विभिन्न स्तरों पर हो सकते हैं:

  • जेनेटिक म्यूटेशन (Genetic mutations) मॉलिक्यूलर या आणविक स्तर पर होने वाले बदलाव हैं, विशेष रूप से DNA  मॉलिक्यूल में। इसलिए वे डीएनए स्ट्रैंड को गढ़ने वाले एक या एकाधिक नाइट्रोजनस बेस पर असर डालते हैं।
  • जीनोमिक, न्यूमेरिकल या करियोटाइप म्यूटेशन (Genetic mutations) जीनोमिक लेवल पर होते हैं। दूसरे शब्दों में ऐसा तब होता है, कहीं एक क्रोमोजोम ज्यादा या गुमशुदा है। हर व्यक्ति में क्रोमोजोम के 46 जोड़े होते हैं। अगर किसी में इससे अलग संख्या में क्रोमोजोम हुए तो वहाँ इस किस्म का म्युटेशन होता है।
  • क्रोमोजोम या संरचनात्मक म्युटेशन (structural mutations) क्रोमोजोम में होता है।
जीन म्यूटेशन कहां हो सकता है?

जीन म्यूटेशन की किस्में

जैसा कि हमने ऊपर बताया, जीन म्यूटेशन जीन की रासायनिक संरचना को प्रभावित करते हैं। दूसरे शब्दों में उस जीन को बनाने वाले डीएनए के न्यूक्लियोटाइड क्रम में ही बदलाव आ जाता है। ये म्युटेशन इनके पीछे छिपे मेकेनिज्म के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं।

डीएनए चेन में होने वाले बदलाव के आधार पर जेनेटिक म्यूटेशन चार तरह के होते हैं। ये चेन दरअसल प्रोटीन हैं जो किसी इमारत की ईंटों की तरह जीवित प्राणियों के डीएनए को बुनती हैं। डीएनए की विशाल संरचना में उनका स्थान   और गठन इस बात पर निर्भर होता है कि वे शरीर में क्या कामकाज करते हैं।

1. प्रतिस्थापन (Substitution)

इसके नाम के अनुसार यह किसी एक चेन के नाइट्रोजनस बेस का दूसरे से आदान-प्रदान है। यह डीएनए के डुप्लीकेट बनने की प्रक्रिया के दौरान होता है जब यह पूरा मेकेनिज्म किसी तरह से फेल होता है और डीएनए स्ट्रैंड में एक गलत बेस घुस जाता है।

सब्सट्यूशन आम तौर पर नुकसानदेह नहीं होता जब तक एक कोडन न बन जाए या प्रोटीन के एक्टिव सेंटर में मौजूद कोई एमिनो एसिड प्रभावित न हो जाए। इस तरह के म्युटेशन से होने वाली बीमारी का एक उदाहरण सिकल-सेल एनीमिया (sickle-cell anemia) है।

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2. सम्मिलन (Insertion)

इस आनुवंशिक उत्परिवर्तन में एक अतिरिक्त बेस जुड़ जाता है। नतीजतन व्यक्ति तमाम बीमारियों का शिकार हो सकता है, उदाहर के लिए,

  • अल्बिनिज्म (Albinism): आंखों, त्वचा और बालों में मेलानिन पिगमेंट की कमी।
  • एल्केप्तोन्यूरिया (Alkaptonuria): इसमें गहरे रंग का पेशाब, संयोजी उत्केतकों में पिगमेंटेशन और क्रोनिक ऑस्टियोआर्थराइटिस हैं।
  • फेनिलकेटोनुरिया (Phenylketonuria) : लीवर में फेनाइलएलेनिन से टाइरोसिन बनने में असमर्थता।

3. विलोपन (Deletion)

ऊपर बताये गए टाइप से अलग इस किस्म के म्यूटेशन में एक बेस छूट जाता है। सम्मिलन और विलोपन प्रतिस्थापन की तुलना में ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि वे पूरे एमिनो एसिड चेन को ही बदल देते हैं। नतीजतन जिस संदेश को डीएनए को ट्रांसमिट करना चाहिए उसकी कोडिंग गलत हो गयी है।

4. स्थान परिवर्तन (Translocation)

इसका अर्थ डीएनए सेगमेंट के स्थान में बदलाव आना है। दूसरे शब्दों में, अणु का एक टुकड़ा टूट जाता है और फिर कहीं दूसरी जगह बंध जाता है। ट्रांसलोकेशन नए नाइट्रोजनस बेस ट्रिपल के उभरने का कारण बनता है। यह इनकोड किये जाने वाले संदेश को वैसे ही संशोधित कर देता है, जैसा कि विलोपन या सम्मिलन म्यूटेशन में होता है।

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जीन म्यूटेशन : निष्कर्ष

आनुवंशिक परिवर्तन डीएनए में होने वाले विभिन्न किस्मे के बदलाव हैं। इससे कई तरह के नए प्रोटीन बन सकते हैं और बीमारियां हो सकती हैं। वैसे हर मामले में ऐसा नहीं होता। क्योंकि किसी जीव के इवोल्यूशन के इतिहास में कई म्युटेशन होते हैं, जो उसे ज़िंदा रहने और परिस्थितियों के मुताबिक़ अनुकूलन कर पाने की क्षमता देते हैं।

म्यूटेशन की जांच-पड़ताल करना भी अहम होता है, क्योंकि इनसे होने वाली बीमारियों के लिए नए इलाज ढूंढ पाने में  मदद मिलती है। इसके अलावा जेनेटिक स्टडी मानव प्रजाति, हमारे प्रदर्शन और अनुकूलन करने की हमारी क्षमता की बेहतर समझ पाने की सहूलियत देती है।

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