बड़े होने का मतलब आपको जिस चीज ने दुःख दिया है उसका मुकाबला करना भी है

मेच्योरिटी उम्र का सवाल नहीं है। जो डर आपको बांधते हैं और खुश होने से रोकते हैं, यह उनका और दूसरे बदलावों का सामना करने की हिम्मत रखने का प्रश्न है।
बड़े होने का मतलब आपको जिस चीज ने दुःख दिया है उसका मुकाबला करना भी है

आखिरी अपडेट: 07 जनवरी, 2019

बड़ा होना सिर्फ जन्मदिन मनाना या मुस्कुराते समय अपनी आंखों के नीचे एक झुर्री देखना नहीं है। बड़े होने का मतलब कठिनाइयों पर काबू पाना और ज्ञान हासिल करना है जो आपको ज्यादा मजबूत, स्वतंत्र और खुश रहने में मदद करता है।

एक बात जो हर कोई जानता है, वह यह है कि कभी-कभी आपके घावों को भरने या डर को कम करने के लिए सिर्फ समय ही पर्याप्त नहीं होता।

इतने साल बीतने के बाद आज भी आप कुछ लोगों से नाराज हो सकते हैं या कुछ स्थितियों से डर सकते हैं जिन्होंने अतीत में आपको नुकसान पहुंचाया है।

बड़े होने का अर्थ यह है कि आप उस क्षण का आनंद लेने के काबिल हैं, जब आप आखिरकार अपने दुस्वप्नों का सामना करते हैं और बिना दर्द के मुस्कुराते हैं।

यह एक तरह का गहरा ज्ञान है जिससे हर कोई अपने डर और गलत एटीच्यूड पर काबू पाकर हासिल कर सकता है। आइए जानें कि कैसे?

बड़े होने से जुड़ी है भावनात्मक रूप से फ्री होने की कला

जीवन के अनुभव सिर्फ 30, 40, 50 या 70 साल की उम्र होने से नहीं आते हैं। ऐसे लोग हैं जो कई दशकों तक जीवित रहने के बाद भी यह नहीं समझ पाते कि इमोशनल मेच्योरिटी के साथ आने वाले शांत, आंतरिक संतुलन को हासिल करने के क्या मायने हैं।

शायद अब आप पूछने वाले हैं, क्या सीखने के लिए दुःख झेलना जरूरी है?

इसका जवाब है, नहीं। यह जरूरी नहीं है कि सीखने के लिए आपको दुःख झेलना चाहिए। खुशी भी एक महान शिक्षक है। क्योंकि यह दिखाती है कि आपके लिए कौन सी चीजें सबसे अहम हैं, आपको किस चीज ने खुश किया, क्या यह चीज आपको जीवन में असली वैल्यू देती है।

अक्सर दुःख आपको रिएक्ट करने के लिए मजबूर करता है। आप जो इमोशनल दर्द महसूस करते हैं वह दुःख झेलने के बाद अवसरों के दरवाजों को खोलने के लिए “पुनर्जन्म” होने की तरह होता है।

हम आपको इस विषय पर सोचने के लिए आमंत्रित करते हैं।

आपका दिमाग नहीं जानता, खुश कैसे रहना है

शायद इस बात पर आपका ध्यान गया होगा। बायोलॉजिस्ट एस्टानिसलाओ बैच्राच (Estanislao Bachrach) सेरेब्रल न्यूरोप्लास्टिसिटी के एक्सपर्ट हैं। उन्होंने दिखाया है, सिर्फ एक बात ही हमारे दिमाग के लिए मायने रखती है। वह है जीवित रहना।

  • खुशी एक ऐसी चीज है जिसे हम पीढ़ी दर पीढ़ी हमेशा पाना चाहते हैं।
  • अब तक जेनेटिक बदलावों और सुधारों की इस विकासवादी चेन के दौरान मनुष्यों ने अभी तक स्वाभाविक रूप से खुश रहने की क्षमता हासिल नहीं की है।
  • आपका दिमाग जीवित रहने का तरीका सीखने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है, और डर हमेशा सीखने के लिए बढ़ावा देता है।

“मैं रेड लाइट के समय सड़क पार करने की हिम्मत नहीं करता हूं क्योंकि मैं कुचला जाऊंगा।” “मुझे उस व्यक्ति से डर लगता है क्योंकि मुझे पता है कि वह मुझे चोट पहुंचा सकता है।” “मुझे उड़ने से डर लगता है क्योंकि मुझे यकीन है कि मैं मर जाऊंगा।”

डर आपके जीवित रहने की गारंटी देने में मदद करता है। पर साथ ही यह आपके खुश होने के अवसरों के पंख भी कतर देता है। यह एक विचित्र बात है, जिस पर सोचा जाना चाहिए।

बड़े होने के लिए आपको बदलने के काबिल होना चाहिए

इमोशनल मेच्योरिटी को बढ़ावा देने के सबसे असरदार तरीकों में से एक यह जानना है कि बदलावों के साथ तालमेल कैसे बिठाया जाए और उनके लिए उत्सुक कैसे रहा जाए।

  • अगर ऐसा कुछ है जिसे आप पसंद नहीं करते हैं तो उसे छोड़ना और कुछ बेहतर खोजना ज्यादा अच्छा है।
  • यदि कोई स्थिति आपको दुखी करती है तो उसे बदलने का समय आ गया है।
  • यदि आपका कोई ऐसा एटीच्यूड है जिसे आप पसंद नहीं करते हैं और जो अपने लक्ष्यों को पाने से रोकता है तो आपको उसे बदलना चाहिए।

बड़े होने का मतलब न केवल अपने को व्यक्तिगत रूप से सुधारने के कुछ कदम उठाने के काबिल होना है, बल्कि उन डरों से छुटकारा पाना भी है जो जीवित रहने में तो आपकी सहायता करते हैं लेकिन आपको कोई खुशी नहीं देते।

बदलना मुश्किल क्यों है

आप सोच रहे होंगे कि लोगों के लिए बदलना इतना मुश्किल क्यों होता है।

  • लोग बदलाव को दर्द के साथ जोड़ते हैं और कोई भी दर्द नहीं पसंद करता।
  • बदलाव के लिए कुछ स्किल और रणनीतियां विकसित करने की जरूरत होती है। कई लोग सोचते हैं कि इसके लिए वे तैयार नहीं हैं।
  • बदलाव हमेशा डर के साथ गलबहियां डाले चलता है। यह वह वृत्ति जो आपको बताती है, “आप जहां हैं वहीं रहना बेहतर है। भले ही आप नाखुश हैं, लेकिन कम से कम जीवित तो रह ही रहे हैं।”

यह गलत एटीच्यूड है। खुशी डर की अनुपस्थिति है। बड़े होने का मतलब है, आपको जिस चीज ने चोट पहुंचाई है उसे देखकर आप मुस्कुरा सकते हैं, क्योंकि अब आपको डर नहीं है, क्योंकि अब डर आपके लिए कोई मायने नहीं रखता है।

आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि बदलाव का र्दनाक होना जरूरी नहीं है। जीवन खुद ही एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका अभिन्न अंग है बदलाव। आपको बस इतना करना है कि रोक-टोक के बिना खुद को इसके साथ चलने दें।

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