पैनिक अटैक को रोकने के 5 आसान तरीके

मई 22, 2018
पैनिक अटैक कभी भी हो सकता है। यह खासतौर से तब होता है जब हमें किसी कठिन स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसलिए इसे रोकने के लिए अपने पास रिलैक्सेशन टेक्निक्स की एक टूलकिट रखना जरूरी है।

पैनिक अटैक से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह बहुत ही भयानक अनुभव होता है और यह व्यक्ति को कमजोर बना देता है।

पता नहीं कौन सी बात इस अटैक को शुरू कर देती है। किसी बात के लिए हद से ज्यादा प्रतिक्रिया क्यों होती है यह कोई नहीं जानता है। व्यक्ति को बिना वजह डर क्यों लगता है? उसे क्यों ऐसा महसूस होता है कि उसे हार्ट अटैक होने वाला है? इन सब बातों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

लेकिन यह पक्की बात है कि ऐसे समय पर व्यक्ति को अपने ऊपर बिलकुल काबू नहीं रहता है और यह दिल दहलाने वाली अवस्था होती है।

किसी भी व्यक्ति को कभी भी ऐसा अनुभव हो सकता है। किसी को भी इतना ज्यादा डर लग सकता है जिसके कारण उसके शरीर में जबरदस्त प्रतिक्रिया हो सकती है।

अगर किसी को एक बार पैनिक अटैक होता है तो आगे चलकर भी उसे ऐसे अटैक होते रहते हैं।

यदि आपके साथ कभी ऐसा हुआ है तो आप किसी प्रोफेशनल से सलाह लेने में संकोच न करें।

एक मनोविज्ञानी या थेरेपिस्ट आपको इसका मुकाबला करने के लिए सही तरीके बता सकता है। लेकिन आप इस अटैक को झेलते हैं इसलिए आपको ही अपनी एंग्जायटी के सही कारण और अपनी परेशानी की जड़ का पता लगाना होगा।

यहाँ पर हम आपको पैनिक अटैक का समाना करते समय याद रखने वाली 5 बातों के बारे में बतायेंगे। आप अपनी जरूरत के हिसाब से मुकाबला करने की युक्ति बनायें तो और भी अच्छा है।

1. स्टेप एक – यह समझें कि आपको पैनिक अटैक हो रहा है

किसी बीमारी में सबसे पहले यह जानना जरूरी होता है कि वह क्या है और किस वजह से होती है।

  • आपको यह बात समझनी चाहिए कि पैनिक अटैक चाहें जितना भी डरावना क्यों न हो आप इसकी वजह से मरेंगे नहीं।
  • पैनिक अटैक एक आम समस्या है जो अक्सर रक्तधारा में अधिक एड्रेनलिन होने के कारण होती है।
  • यह डर की वजह से शुरू होता है। अक्सर यह डर तर्कहीन होता है। ज्यादातर हमें पता भी नहीं होता है कि क्यों डर लग रहा है या उस पर कैसे काबू पाया जाये।

मज़े की बात यह है कि एंग्जायटी हमारे नेचुरल सहज रक्षा तंत्र का हिस्सा है। इसका काम हमें खतरनाक स्थितियों से बचने के लिए तैयार करना है।

पुराने जमाने में यह प्रतिक्रिया हमें हमला करने वालों से बचाती थी। लेकिन आजकल की भागदौड़ की आधुनिक दुनिया में कई बार हम अपने जीवन और रोज की उलझनों के शिकार बन जाते है।

2. पैनिक अटैक के लक्षणों को पहचानें

पैनिक अटैक को रोकें

पैनिक अटैक एक विस्फोट की तरह होता है। आइये हम एक उदाहरण को देखें। मारिया एक 42 साल की महिला है। उसके पास एक अच्छी जॉब, तीन बच्चे, एक पार्टनर और एक बुजुर्ग रिश्तेदार है जिनकी वह देखभाल करती हैं।

  • बाहर से देखने में ऐसा लगता है कि उसके ऊपर कई जिम्मेदारियां हैं सिर्फ यही उसकी एक उलझन है। जिंदगी भर वह अपनी सब जिम्मेदारियों को आराम से निभाती रही हैं। लेकिन कुछ समय से उसको पैनिक अटैक होने लगे हैं। ये ऐसे समय पर होते हैं जब वह उनके लिए बिलकुल तैयार नहीं होती हैं।
  • कभी-कभी यह अटैक काम पर जाने से पहले या अपने पार्टनर या बच्चों के साथ बहस करने के बाद होते हैं।
  • दो साल पहले उनके पिता चल बसे। यह उनके लिए एक दर्दनाक अनुभव था पर उसको विश्वास है कि अब वह उसके बारे में भूल गयी हैं।
  • लेकिन एक महीने पहले उनके घर के पालतू जानवर की मृत्यु हो गयी और उसे अपना पुराना दर्द याद आ गया।

यहाँ पर हम देख सकते हैं कि कई बातें एक साथ मिलकर एक जटिल स्थिति बना देती हैं – तनाव, दबाव, गमी, पालतू जानवर का जाना आदि।

अब मारिया को बार-बार अटैक होने लगे हैं। उनके डॉक्टर ने उन्हें इसके लक्षणों को पहचानना सिखा दिया है। इसलिए वह सही तरीके से उनका मुकाबला कर लेती हैं।

इसके लक्षण हैं –

  • हृदय का तेज़ी से धड़कना या टैकीकार्डिया
  • नेगेटिव विचार
  • दिल बैठा जाना या ऐसा महसूस होना कि हृदय की धड़कन बंद होने जा रही है
  • साँस लेने में परेशानी
  • पेट में दर्द
  • चक्कर आना
  • पसीना आना

3. साँस का नियंत्रण

पैनिक अटैक को रोकने का तरीका

पैनिक अटैक को शांत करने और रोकने के लिए साँस पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है।

हमें याद रखना चाहिए कि माने हुए खतरे के प्रति हमारी साइकोलॉजिकल प्रतिक्रिया शारीरिक रूप ले लेती है।

इसलिए पैनिक अटैक के समय अपनी साँस को नियमित करने की कोशिश करके हम अपने हृदय की धड़कन को तेज़ होने से  रोक सकते हैं।

अगर आपको पैनिक अटैक के शारीरिक लक्षण दिखाई देते हैं तो आप किसी शांत जगह पर जाकर बैठ जायें। यदि आप कसे हुए कपड़े या जैकेट वगैरह पहने हुए हैं तो बटन खोलें या उनको उतारें ताकि आपको बंधा हुआ न महसूस हो।

  • अब आप 5 सेकंड के लिए साँस को अंदर लें।
  • साँस को 7 सेकंड के लिए रोकें।
  • साँस को 8 सेकंड के लिए बाहर छोड़ें।

इस पैटर्न को 5 मिनट तक दोहराते रहें।

4. नेगेटिव विचारों को रोकें

पैनिक अटैक से बचने का उपाय

पैनिक अटैक के समय नेगेटिव विचारों के झोंके आते हैं। ऐसा लगता है जैसे आप कोई दरवाज़ा खोलकर तूफान को अपने मन में प्रवेश करने दे रहे हैं।

आपको इन विचारों को ब्लाक करना और नेगेटिविटी वेव को रोकना सीखना चाहिए। आप “नहीं” कहें और एक आसान और असरदार विज्वलाइज़ेशन टेकनीक से अपने मन का नियंत्रण करें।

  • अपने नेगेटिव विचारों को जलती हुई मोमबत्तियों जैसे देखें।
  • फिर साँस अंदर लें और सब मोमबत्तियों को एक के बाद एक फूंककर बुझायें।

पैनिक अटैक के समय नेगेटिव विचार आपको परेशान करते हैं और एंग्जायटी को बढ़ाते हैं। यह टेकनीक आपको अपने नेगेटिव विचारों को विराम देते समय शांति से साँस लेने में मदद करती है।

5. अपने को शांत करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण वाक्य इस्तेमाल करें

अटैक के समय शांत होने के लिए आप कुछ वाक्यों का  उपयोग कर सकते हैं। हर एक व्यक्ति को कुछ ऐसे वाक्यांश चुनने चाहियें जो उनके लिए व्यक्तिगत रूप से अनुकूल हैं।

उदाहरण के लिए:

  • “सब कुछ ठीक है – मैं शांत हो जाऊंगा, और मेरा मन संतुलित है।”
  • जो कुछ भी होने वाला है वह हो चुका है। मैं सुरक्षित हूँ, और मुझे कोई चीज चोट नहीं पहुंचायेगी।”
  • “रुको, खड़े हो, और नियंत्रण करो। लगाम को अपने हाथों में लो और इसी समय शांत हो जाओ।”
  • “मुझे कुछ नहीं होगा। मैं सुरक्षित हूँ, मुझे सिर्फ एक गहरी साँस लेने और अपने ऊपर विश्वास रखने की जरूरत है।”

हमलोगों ने यहाँ पर जिन युक्तियों के बारे में चर्चा की है वे बहुत ही बेसिक हैं पर उनका जोरदार असर हो सकता है। आप चाहें तो अपने लिए कोई नयी युक्तियाँ बनायें या यहाँ पर बताई गयी युक्तियों को अपनी पर्सनैलिटी और जरूरतों के अनुसार एडजस्ट करें। ये आपके लिए संकट के समय में बहुत उपयोगी सिद्ध होंगी।

Seligman, M.E.P.; Walker, E.F.; Rosenhan, D.L. Abnormal psychology (4th ed.). New York: W.W. Norton & Company.

Trickett, S. (2009). Cómo superar los ataques de pánico. Editorial Hispano – Europea. Barcelona – España.

Sylvers, Patrick; Lilienfeld, Scott O.; Laprairie, Jamie L. (2011). “Differences between trait fear and trait anxiety: Implications for psychopathology”. Clinical Psychology Review. 31 (1): 122 – 37.